Ayodhya Ram Mandir Fund Scam: चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा; SIT जांच के बाद ड्राइवर समेत 8 गिरफ्तार, राजनीति गरमाई

देश और दुनिया के करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र—अयोध्या का भव्य राम मंदिर, इस वक्त एक ऐसे विवाद के केंद्र में है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। रामलला के चरणों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई अगाध श्रद्धा और गाढ़ी कमाई के चंदे में ‘महाडकैती’ का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राम मंदिर आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे और ट्रस्ट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले महासचिव चंपत राय और प्रमुख ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की शुरुआती रिपोर्ट के आते ही अयोध्या से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है। जहाँ एक तरफ पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी कर मुख्य सूत्रधार और चंपत राय के ड्राइवर टिन्नू समेत 8 लोगों को सलाखों के पीछे भेज दिया है, वहीं विपक्ष इसे “चंदा चोरी का महाघोटाला” करार देकर सरकार और ट्रस्ट को कटघरे में खड़ा कर रहा है।
Ayodhya Ram Mandir Fund Scam: कैसे खुली चोरी की पोल? अंदरूनी गुटबाजी और मीडिया का दखल
सूत्रों के मुताबिक, राम मंदिर परिसर में दानपात्रों से चढ़ावे की राशि और कीमती सामानों का गबन पिछले काफी समय से चल रहा था। सेवादारों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों को इसकी भनक थी, लेकिन ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों का वरदहस्त होने के कारण कोई भी मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
पिछले दो सालों में चंपत राय के करीबी और उनके ड्राइवर रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू का दबदबा मंदिर परिसर में अत्यधिक बढ़ गया था। दानपात्रों की चाबियां तक टिन्नू के पास रहने लगी थीं। यह बात वहां काम करने वाले एक दूसरे गुट को नागवार गुजरी। इस विरोधी गुट ने योजनाबद्ध तरीके से टिन्नू और उसके साथियों की गतिविधियों पर नजर रखी, पुख्ता सबूत और तथ्य जुटाए और फिर इस पूरे मामले को मीडिया तक पहुंचा दिया। मीडिया में खबरें आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले का तुरंत संज्ञान लिया और उच्च स्तरीय SIT जांच के आदेश दिए।
SIT की जांच और एफआईआर की इनसाइड स्टोरी
मामले की गंभीरता को देखते हुए यूपी सरकार के गृह विभाग ने लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। SIT ने राम जन्मभूमि परिसर में डेरा डालकर करीब 150 ऐसे सेवादारों, बैंक कर्मियों और कर्मचारियों को चिह्नित किया, जिनकी आर्थिक स्थिति 22 जनवरी 2024 (रामलला की प्राण प्रतिष्ठा) के बाद अचानक और अस्वाभाविक रूप से बदल गई थी।
SIT को जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के जरिए साफ सबूत मिले कि चढ़ावे की रकम की गिनती के दौरान जानबूझकर और आपराधिक साजिश के तहत बड़ी मात्रा में कैश और कीमती सामान गायब किया जा रहा था।
25 जून की शाम दर्ज हुई पहली FIR
SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर, गुरुवार 25 जून को शाम 7:21 बजे ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर अयोध्या के स्थानीय थाने में 8 नामजद और 9 आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई। इस एफआईआर में ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ (Prevention of Corruption Act) की धाराएं भी जोड़ी गई हैं, जिससे साफ है कि यह मामला केवल सामान्य चोरी का नहीं बल्कि एक संगठित भ्रष्टाचार का है।
अदालत की कार्रवाई: 14 दिन की जेल और बड़ी बरामदगी
शुक्रवार 26 जून 2026 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किए गए सभी 8 आरोपियों का मेडिकल परीक्षण कराया और उन्हें अयोध्या की सीजेएम (CJM) कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए सभी आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
सीजेएम कोर्ट के अभियोजन अधिकारी केसी वर्मा ने मीडिया को बताया:
“सभी 8 आरोपियों को सोमवार तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेजा गया है, जहां उन्हें दोबारा कोर्ट में पेश किया जाएगा। अब तक की कार्रवाई में आरोपियों के पास से कुल 79,985,493 रुपये (लगभग 80 लाख रुपये) की नकदी बरामद की जा चुकी है। केवल एक आरोपी सुभाष से कोई नकद बरामदगी नहीं हुई है, लेकिन वह इस पूरी आपराधिक साजिश का मुख्य हिस्सा था।”
जेल में विशेष सुरक्षा: अलग बैरक में रखे गए आरोपी
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मंडलीय जेल अधीक्षक मुकेश कुमार ने बताया कि राम मंदिर दान चोरी मामले से जुड़े सभी आठों कैदियों को जेल की सामान्य बैरकों से अलग एक विशेष बैरक में रखा गया है। मंदिर से जुड़े होने के कारण अन्य कैदियों से उन्हें कोई खतरा न हो, इसके लिए सुरक्षा के बेहद कड़े और पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
सिंडिकेट का खुलासा: सरकारी कर्मचारी और SBI स्टाफ भी शामिल
अभियोजन अधिकारी केसी वर्मा के बयानों से एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस महाठगी में केवल मंदिर के छोटे कर्मचारी या सेवादार ही शामिल नहीं थे, बल्कि इसमें सरकारी वेतन पाने वाले अधिकारी और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के कर्मचारी भी शामिल हैं।
चढ़ावे की रकम को गिनने और उसे बैंक में जमा कराने की जिम्मेदारी जिन 5 से 6 एसबीआई कर्मचारियों पर थी, वे भी इस सिंडिकेट का हिस्सा थे। यह कर्मचारी बैंक में एंट्री करने के दौरान आंकड़ों में हेरफेर करते थे। आने वाले दिनों में कई बड़े वित्तीय अधिकारियों और सरकारी बाबुओं की गिरफ्तारी भी तय मानी जा रही है।
चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा: ट्रस्ट के पुनर्गठन की तैयारी
चढ़ावे की चोरी के आरोपों और एसआईटी की रडार पर आने के बाद, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। ट्रस्टी नृपेंद्र मिश्रा ने भी इस बात की पुष्टि की है कि दोनों के इस्तीफे प्राप्त हो चुके हैं। इसके साथ ही मंदिर निर्माण प्रभारी गोपाल राव को भी व्यवस्थाओं से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है।
नृपेंद्र मिश्र बन सकते हैं नए सीईओ (CEO)
सूत्रों के मुताबिक, अब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पूरी तरह से कायाकल्प और पुनर्गठन किया जाएगा। प्रारंभिक रिपोर्ट में SIT ने सुझाव दिया है कि चंदे और प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए किसी सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी (IAS) या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ट्रस्ट का मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) नियुक्त किया जाना चाहिए।
इस रेस में राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्र का नाम सबसे आगे चल रहा है। चूंकि परिसर के मुख्य मंदिरों का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है, इसलिए उनका बतौर निर्माण समिति अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। वे शुरुआत से ही ट्रस्ट के सदस्य रहे हैं और पीएम नरेंद्र मोदी के बेहद भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं। नए ट्रस्टियों और सीईओ की नियुक्ति का अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत और सीएम योगी आदित्यनाथ की त्रिपड़ी की सहमति से लिया जाएगा।
जमीन घोटाले की कड़ियों ने बढ़ाई चंपत राय की मुश्किलें
चढ़ावे की चोरी के अलावा ट्रस्ट पर जमीनों की खरीद-फरोख्त में भी भारी हेरफेर के आरोप लगे हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद संजय सिंह ने लखनऊ में SIT अध्यक्ष विजय विश्वास पंत से मुलाकात कर जमीन घोटाले से जुड़े 11 महत्वपूर्ण और मूल दस्तावेज सौंपे हैं।
संजय सिंह द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों के मुख्य बिंदु:
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2 करोड़ की जमीन 18 करोड़ में: हरीश और कुसुम पाठक नामक व्यक्तियों ने 18 मार्च 2021 को अपनी सवा हेक्टेयर जमीन दो करोड़ रुपये में बेची। इसके महज 10 मिनट के भीतर, ट्रस्ट ने उसी जमीन को साढ़े 18 करोड़ रुपये में खरीद लिया। इस सौदे के गवाह ट्रस्टी अनिल मिश्रा और तत्कालीन भाजपा मेयर ऋषिकेश उपाध्याय थे।
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नजूल की जमीन का सौदा: 2 अप्रैल 2024 को 2.92 करोड़ की जमीन चंपत राय को 24 करोड़ में बेची गई, जबकि अयोध्या के एसडीएम की रिपोर्ट के मुताबिक वह जमीन नजूल (सरकारी) की थी, जिसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता था।
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रिश्तेदारों को फायदा: तत्कालीन भाजपा मेयर के भतीजे दीप नारायण ने जो जमीन महज 20 लाख में खरीदी थी, उसे कुछ महीनों बाद ट्रस्ट को 1 करोड़ रुपये में बेचकर सीधा मुनाफा कमाया गया।
भयानक सियासी घमासान: विपक्ष के तीखे बाण
इस खुलासे के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर चौतरफा हमला बोल दिया है।
1. अरविंद केजरीवाल (राष्ट्रीय संयोजक, AAP):
“भगवान राम के घर में महाडकैती हो गई है। उनका सोना, चांदी, आभूषण और अरबों रुपए का कैश गायब है। 30 साल तक राम नाम पर वोट मांगकर सत्ता में आने वाली ‘चंदा चोर पार्टी’ ने राम मंदिर को अपनी हवस का शिकार बना लिया है। यह FIR सिर्फ एक दिखावा है, जिसमें छोटे प्यादों को फंसाकर बड़े राक्षसों को बचाने की कोशिश हो रही है।”
2. संजय राउत (सांसद, शिवसेना – UBT):
“अयोध्या राम मंदिर के लिए शिवसेना और उद्धव ठाकरे जी ने हजारों शिवसैनिकों की मौजूदगी में 1 करोड़ रुपये और 4 किलो चांदी की पवित्र ईंट दान की थी। इतने साल बीत जाने के बाद भी ट्रस्ट ने हमें कोई रसीद नहीं दी। अब देश को जवाब चाहिए कि उद्धव जी की वह चांदी की ईंट कहां गई? इसकी पूरी जांच होनी चाहिए।”
3. अखिलेश यादव (अध्यक्ष, सपा):
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इस पूरी कार्रवाई पर तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर लिखा— “फुनगी को फांसी, शाखाओं को मिलेगी माफी।” उनका सीधा इशारा था कि छोटे कर्मचारियों को मोहरा बनाकर जेल भेजा जा रहा है, जबकि घोटाले के मुख्य सूत्रधारों को बख्शा जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा का राजनीतिक ‘लंकाकांड’ अब अयोध्या की धरती से ही शुरू होगा।
सरकार का रुख: ‘आस्था से खिलवाड़ पर ज़ीरो टॉलरेंस’
चौतरफा हमलों के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोर्चा संभालते हुए विपक्ष को करारा जवाब दिया है। सीएम योगी ने साफ किया कि उनकी सरकार जनभावनाओं और सनातन के मूल्यों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।
सीएम योगी ने कहा:
“जैसे ही SIT की शुरुआती रिपोर्ट आई, हमारी सरकार ने बिना एक पल गंवाए कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी। कानून के हाथ बहुत लंबे हैं, चाहे कोई कितना भी बड़ा पदाधिकारी क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। जो लोग आज आक्षेप लगा रहे हैं, ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी कोर्ट में वकीलों की फौज खड़ी करके भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था।”
इसके साथ ही डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और यूपी के मंत्री सुरेश खन्ना ने भी आश्वस्त किया है कि सरकार इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करा रही है और दोषियों को ऐसी सजा मिलेगी जो एक नजीर बनेगी।
मानसून सत्र में गूंजेगा मुद्दा
कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को संसद में घेरने की रणनीति तैयार कर ली है। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और राजीव शुक्ला ने कहा है कि आगामी मानसून सत्र में राम मंदिर चढ़ावा चोरी के इस गंभीर मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया जाएगा। करोड़ों गरीबों और ग्रामीणों ने अपनी गाढ़ी कमाई से जो चंदा दिया था, उसकी पाई-पाई का हिसाब सरकार को संसद के पटल पर देना होगा।
ऑडिट फर्म की चेतावनियां और भविष्य का रोडमैप
इस घोटाले के सामने आने के बाद यह बात भी उजागर हुई है कि एक नामी ऑडिट फर्म ने पहले ही ट्रस्ट के फंड मैनेजमेंट को लेकर कई गंभीर सुझाव दिए थे।
ऑडिट फर्म के प्रमुख सुझाव जो नजरअंदाज किए गए:
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कीमती सामानों, सोने और चांदी के लिए एक सख्त ‘स्टॉक रजिस्टर’ अनिवार्य रूप से बनाया जाए।
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बैंक रिकॉर्ड्स का हर हफ्ते या नियमित अंतराल पर मिलान (Reconciliation) किया जाए।
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वेबसाइट पर इंटरनल ऑडिट रिपोर्ट और Standard Operating Procedure (SOP) को सार्वजनिक किया जाए।
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आईटी और डेटा सुरक्षा को मजबूत किया जाए ताकि वित्तीय गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे।
ट्रस्ट की फाइलों के मुताबिक, 5 फरवरी 2020 को ट्रस्ट के गठन से लेकर नवंबर 2025 तक लगभग 4575 करोड़ रुपये से अधिक का नकद और भारी मात्रा में सोना-चांदी दान में मिल चुका है। इतने बड़े फंड के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी ही इस महाघोटाले का मुख्य कारण बनी।
निष्कर्ष: आस्था की शुचिता बहाल करने की चुनौती
राम मंदिर सिर्फ एक भव्य इमारत नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर सनातनी आस्था, विश्वास और शुद्धता का प्रतीक है। वहां से इस तरह के वित्तीय गबन और भ्रष्टाचार की खबरें आना निश्चित रूप से संपूर्ण हिंदू समाज के लिए अत्यंत पीड़ादायक और लज्जाजनक है। चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा इस बात का प्रमाण है कि दाग बहुत गहरे लग चुके हैं।
अब सरकार और न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इस जांच को बिना किसी राजनीतिक दबाव के इसके तार्किक अंत तक पहुंचाएं। छोटे प्यादों के साथ-साथ यदि इसमें कोई ‘बड़ा हाथ’ शामिल है, तो उसे भी बेनकाब किया जाए, ताकि रामलला के दरबार की शुचिता, निष्पक्षता और करोड़ों भक्तों का अटूट विश्वास फिर से बहाल हो सके

