जयपुर में आमेर, जयगढ़ और नाहरगढ़ किलों को जोड़ने वाले राजस्थान के सबसे बड़े रोपवे प्रोजेक्ट पर राजस्थान हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अंतरिम रोक लगा दी। यह प्रोजेक्ट करीब 6.5 किलोमीटर लंबा प्रस्तावित था और इसे राज्य का सबसे लंबा रोपवे बताया जा रहा था। मामले में टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और राजस्थान पारदर्शिता लोक उपापन अधिनियम (RTPP एक्ट) के उल्लंघन को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 2 फरवरी 2026 को दी गई सरकारी मंजूरी पर रोक लगा दी और अगली सुनवाई 19 मई तय की है।

यह मामला उस समय और ज्यादा चर्चाओं में आ गया जब याचिकाकर्ता फर्म ने दावा किया कि वह इस पूरे रोपवे प्रोजेक्ट को लगभग 80 करोड़ रुपए की लागत में पूरा करने को तैयार थी, लेकिन सरकार ने करीब 350 करोड़ रुपए की लागत बताने वाली दूसरी कंपनी को शुरुआती मंजूरी दे दी। याचिकाकर्ता फर्म शिवम प्राइम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अभि गोयल और हार्दिक मिश्रा ने अदालत में तर्क दिया कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं थी और इसमें RTPP एक्ट के नियमों का पालन नहीं किया गया।
जस्टिस समीर जैन की अदालत में सुनवाई के दौरान कहा गया कि इस प्रोजेक्ट के लिए कोई सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं किया गया, जबकि यह सरकारी खरीद प्रक्रिया के दायरे में आने वाला बड़ा प्रोजेक्ट था। इसके बावजूद केवल तीन फर्मों ने आवेदन किया और पूरी प्रक्रिया सीमित दायरे में पूरी कर दी गई। याचिकाकर्ता पक्ष का आरोप है कि सरकार ने कम लागत और पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित प्रस्ताव को नजरअंदाज कर अधिक लागत वाली कंपनी को फायदा पहुंचाया।
कोर्ट में पेश दस्तावेजों के अनुसार 2 सितंबर 2025 को हुई बैठक में यह स्पष्ट हुआ था कि याचिकाकर्ता कंपनी लगभग 80 करोड़ रुपए में रोपवे बनाने को तैयार थी। कंपनी ने दावा किया कि उसके प्रस्ताव में वन क्षेत्र और पेड़-पौधों को बेहद कम नुकसान होता। इसके विपरीत दूसरी फर्म जीआर इंफ्रा ने करीब 350 करोड़ रुपए की लागत का प्रस्ताव रखा था, जिसमें वन भूमि और हरित क्षेत्र को नुकसान पहुंचने की संभावना भी शामिल थी। इसके बावजूद सरकार ने 2 फरवरी 2026 को जीआर इंफ्रा को काम देने की शुरुआती मंजूरी प्रदान कर दी।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने अदालत को बताया कि यह पूरी प्रक्रिया RTPP एक्ट-2012 की धारा 2(13) के तहत आती है, इसलिए पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य था। लेकिन नियमों का पालन किए बिना ही फर्म का चयन कर लिया गया। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए प्रोजेक्ट पर रोक लगाने का फैसला सुनाया।
दरअसल, राजस्थान सरकार ने धार्मिक और पर्यटन स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के लिए रोपवे परियोजनाओं की घोषणा की थी। इसी योजना के तहत जयपुर के ऐतिहासिक आमेर किला, जयगढ़ किला और नाहरगढ़ किले को जोड़ने वाला यह महत्वाकांक्षी रोपवे प्रोजेक्ट सामने आया। सरकार का दावा था कि इस परियोजना से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और पर्यटकों को एक ही सफर में तीनों ऐतिहासिक किलों का अनुभव मिल सकेगा।
यह प्रोजेक्ट साल 2024 में पहली बार चर्चा में आया था। बजट में घोषणा के बाद इसके लिए फंड भी अलॉट किया गया। परियोजना को राजस्थान पर्यटन के लिए गेम चेंजर बताया जा रहा था। आमेर, जयगढ़ और नाहरगढ़ किले जयपुर की ऐतिहासिक पहचान माने जाते हैं और हर साल लाखों देशी-विदेशी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। ऐसे में रोपवे बनने से पर्यटकों को सुविधाजनक यात्रा मिलने की उम्मीद थी।
हालांकि प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही पर्यावरण और टेंडर प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे थे। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना था कि अगर निर्माण कार्य सही तरीके से नहीं किया गया तो अरावली क्षेत्र और वन संपदा को नुकसान हो सकता है। वहीं अब टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद यह मामला कानूनी विवाद में बदल गया है।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल इस प्रोजेक्ट पर काम रुक गया है। अब सभी की नजर 19 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हुई है। यदि अदालत को टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी के पर्याप्त सबूत मिलते हैं तो सरकार को पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार अपनी प्रक्रिया को सही साबित कर देती है, तो यह महत्वाकांक्षी रोपवे प्रोजेक्ट फिर से आगे बढ़ सकता है।
फिलहाल इस मामले ने राजस्थान में सरकारी परियोजनाओं की पारदर्शिता, पर्यावरण सुरक्षा और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल भी अब इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। वहीं पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोग चाहते हैं कि परियोजना जरूर बने, लेकिन पूरी पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन के साथ।

