Bareilly: मौलाना तौकीर रज़ा की जमानत याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को माना महत्वपूर्ण
Bareilly के चर्चित बरादरी प्रकरण में दर्ज एफआईआर संख्या 1146/25 के मामले में मौलाना तौकीर रज़ा को बड़ा झटका लगा है। माननीय हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। इस मामले की मॉनिटरिंग वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) बरेली के निर्देशन में की जा रही थी, जबकि क्षेत्राधिकारी नगर प्रथम आशुतोष शिवम द्वारा प्रकरण का निकट पर्यवेक्षण किया जा रहा था।

सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) नितेश श्रीवास्तव ने न्यायालय में प्रभावी पैरवी करते हुए केस डायरी में संकलित साक्ष्यों को विस्तार से प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार विवेचक संजय कुमार धीर ने न्यायालय के समक्ष ऐसे साक्ष्य रखे, जिनसे यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि 26 सितंबर 2025 को हुए कथित दंगे की पूर्व योजना 19 सितंबर 2025 को फरीदापुर में बनाई गई थी।
केस डायरी में दर्ज तथ्यों के अनुसार बैठक के दौरान दंगे की रणनीति तैयार की गई, हथियारों की व्यवस्था की गई तथा विभिन्न व्यक्तियों को कथित रूप से दंगे में शामिल करने की योजना बनाई गई। अभियोजन का यह भी दावा था कि लोगों को उकसाने और भीड़ एकत्रित करने के लिए आईएमसी के पदाधिकारियों की सक्रिय भूमिका रही। इन सभी गतिविधियों में मौलाना तौकीर रज़ा को मुख्य षड्यंत्रकारी के रूप में चिन्हित किया गया।
विवेचना के दौरान घटना से पहले और बाद के विभिन्न साक्ष्य संकलित किए गए। न्यायालय में वीडियो साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए, जिनके आधार पर अभियोजन पक्ष ने अपने तर्कों को मजबूत करने का प्रयास किया। साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया में उप निरीक्षक त्रिवेंद्र कुमार की भी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई।
वहीं दूसरी ओर बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने जमानत के समर्थन में कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। डिफेंस काउंसिल ने कहा कि मौलाना तौकीर रज़ा इस मुकदमे में नामजद अभियुक्त नहीं हैं और उनका नाम बाद की विवेचना के दौरान प्रकाश में आया है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि इसी मामले में कई अन्य अभियुक्तों को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जमानत अथवा अग्रिम जमानत प्रदान की जा चुकी है। इसलिए समानता के सिद्धांत के आधार पर मौलाना तौकीर रज़ा को भी जमानत का लाभ मिलना चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन द्वारा उन्हें मुख्य षड्यंत्रकारी बताया जाना तथ्यों से परे है और उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं किया गया है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने इन तर्कों का जोरदार प्रतिवाद किया।
अपर शासकीय अधिवक्ता नितेश श्रीवास्तव ने न्यायालय को बताया कि 19 सितंबर 2025 से लेकर 26 सितंबर 2025 तक की घटनाओं की श्रृंखला में मौलाना तौकीर रज़ा की सक्रिय भूमिका सामने आई है। अभियोजन ने यह भी उल्लेख किया कि घटना के बाद उनके द्वारा एक धन्यवाद ज्ञापन संबंधी वीडियो जारी किया गया था, जिसे अभियोजन ने उनकी कथित भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत बताया।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि यद्यपि एफआईआर में उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं था, लेकिन प्रथम सूचना रिपोर्ट के विवरण और बाद में एकत्र किए गए साक्ष्यों में उनका उल्लेख सामने आया है। इसलिए उन्हें जमानत दिए जाने का कोई आधार नहीं बनता।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद माननीय हाईकोर्ट ने मौलाना तौकीर रज़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी। न्यायालय के इस निर्णय को मामले की जांच और अभियोजन पक्ष के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं इस बहुचर्चित प्रकरण पर अब आगे की न्यायिक कार्यवाही और सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

