Bareilly में करोड़ों की जमीन आवंटन को लेकर उठे सवाल, उच्च स्तरीय जांच की मांग
Bareilly में नगर निगम की एक परियोजना को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। डीडीपुरम स्थित कुष्ठ आश्रम से सटी नगर निगम की बहुमूल्य भूमि पर बने फूड कोर्ट और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि नगर निगम अधिकारियों और एक निजी कंपनी की कथित मिलीभगत से नगर निगम तथा सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया गया है। इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की गई है।

आरोपों के अनुसार, नगर निगम की करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि को बेहद कम कीमत पर एक निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से उपलब्ध कराया गया। बताया जा रहा है कि इस भूमि पर लगभग तीन करोड़ रुपये की लागत से फूड कोर्ट का निर्माण कराया गया है, लेकिन निर्माण प्रक्रिया और इसके संचालन को लेकर शुरू से ही कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि परियोजना में नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई तथा सार्वजनिक हितों की बजाय निजी हितों को प्राथमिकता दी गई।
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू स्ट्रीट वेंडरों और छोटे दुकानदारों से भी जुड़ा हुआ है। दावा किया गया है कि जिस स्थान पर फूड कोर्ट का निर्माण किया गया, वहां वर्षों से छोटे व्यापारी और स्ट्रीट वेंडर अपनी दुकानें संचालित कर रहे थे। बिना किसी स्पष्ट नीति, पुनर्वास योजना या वैकल्पिक व्यवस्था के इन लोगों को वहां से हटाया गया, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है। आरोप है कि गरीब और छोटे व्यापारियों के अधिकारों की अनदेखी कर बड़े व्यावसायिक हितों को बढ़ावा दिया गया।
आरोप लगाने वालों का यह भी कहना है कि परियोजना के अंतर्गत नई दुकानों और व्यावसायिक स्थानों की कीमत इतनी अधिक रखी गई है कि पहले से वहां व्यापार कर रहे छोटे दुकानदार उन्हें खरीदने या किराए पर लेने में सक्षम नहीं हैं। इससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उनका मानना है कि विकास कार्यों के नाम पर गरीब व्यापारियों को हाशिये पर धकेला जा रहा है।
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय लेनदेन से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि एक निजी फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए बेहद कम दरों पर टेंडर जारी किया गया। साथ ही परियोजना से जुड़े वित्तीय लेनदेन में भी गड़बड़ी की आशंका जताई गई है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए तो करोड़ों रुपये के घोटाले का खुलासा हो सकता है। इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य संबंधित विभागों को पत्र भेजकर विजिलेंस, आर्थिक अपराध शाखा अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई है।
मामले में यह सवाल भी उठाया गया है कि जिस व्यावसायिक परिसर का निर्माण किया गया है, उसके लिए आवश्यक विभागीय स्वीकृतियां और अनुमति पत्र मौजूद हैं या नहीं। आरोप है कि निर्माण कार्य के लिए बरेली विकास प्राधिकरण की स्वीकृति और अग्निशमन विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जैसी महत्वपूर्ण औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह नियमों के गंभीर उल्लंघन का मामला बन सकता है।
हालांकि नगर निगम प्रशासन ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि परियोजना पूरी तरह नियमों के अनुरूप संचालित की गई है और किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है। अधिकारियों के अनुसार शहर में तेजी से विकास कार्य कराए जा रहे हैं और लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर शहर में चर्चा का माहौल है। एक ओर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, नियमों के उल्लंघन और गरीब व्यापारियों के अधिकारों के हनन के आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन सभी आरोपों को नकार रहा है। अब सबकी निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

