प्राकृतिक खेती अपनाने की जरूरत, नहीं तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी: राज्यपाल आचार्य देवव्रत
जयपुर। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने रासायनिक खेती के बढ़ते दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि हम समय रहते नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि आज हम खेती नहीं, बल्कि पाप कर रहे हैं। अत्यधिक रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग ने न केवल जमीन की उर्वरता को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।
आचार्य देवव्रत जयपुर के सवाई मानसिंह इंडोर स्टेडियम में आयोजित प्रदेश स्तरीय प्राकृतिक एवं जैविक खेती कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य राजस्थान में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देना तथा किसानों को रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान, कृषि विशेषज्ञ और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
अपने संबोधन में राज्यपाल ने हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने सीमित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की सिफारिश की थी। आचार्य देवव्रत ने कहा कि स्वामीनाथन ने लगभग ढाई एकड़ भूमि में 13 किलोग्राम नाइट्रोजन डालने की सलाह दी थी, लेकिन आज कई क्षेत्रों में किसान एक एकड़ में 13 कट्टे यूरिया तक डाल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति नष्ट हो रही है। जमीन में मौजूद सूक्ष्म जीव और अन्य लाभकारी जीव-जंतु खत्म होते जा रहे हैं। इससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि इतनी अधिक मात्रा में रसायन जमीन में डाले जाएंगे तो विनाश नहीं होगा तो क्या होगा।
राज्यपाल ने कहा कि करोड़ों टन यूरिया और अन्य रासायनिक खादों के उपयोग ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। उन्होंने दावा किया कि रासायनिक खेती से पैदा होने वाली फसलों में मौजूद अवशेष धीरे-धीरे मानव शरीर में पहुंचते हैं और विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि आज बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएं, ऑर्गन फेलियर और कई अन्य जटिल रोग कहीं न कहीं हमारी कृषि पद्धतियों से भी जुड़े हुए हैं।
आचार्य देवव्रत ने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल भूमि की उर्वरता को बनाए रखती है, बल्कि खेती की लागत भी कम करती है। इसके अलावा इससे उत्पादित खाद्यान्न अधिक सुरक्षित और पौष्टिक होता है। उन्होंने किसानों को रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने तथा गो-आधारित और जैविक खेती के तरीकों को अपनाने की सलाह दी।
कार्यशाला के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने भी प्राकृतिक खेती के लाभों पर प्रकाश डाला। विशेषज्ञों ने बताया कि जैविक और प्राकृतिक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है, जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। साथ ही किसानों को बाजार में जैविक उत्पादों के बेहतर मूल्य मिलने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।
राजस्थान में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य और केंद्र सरकार विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। इस दिशा में किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और प्रोत्साहन देने के प्रयास किए जा रहे हैं। कार्यक्रम में मौजूद किसानों ने भी प्राकृतिक खेती के प्रति रुचि दिखाई और इसे भविष्य की खेती का बेहतर विकल्प बताया।
आचार्य देवव्रत ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है। इसलिए किसानों और समाज को मिलकर ऐसी खेती को बढ़ावा देना होगा जो धरती, पर्यावरण और मानव जीवन के लिए लाभकारी हो।

