ईरान-इजराइल जंग ने हिला दिया वैश्विक तेल भंडार, 36 साल के निचले स्तर पर पहुंचा रिजर्व

होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी संकट टला नहीं, एक्सपर्ट्स बोले- सामान्य होने में लगेंगे महीनों
ईरान और अमेरिका के बीच समझौता होने के बाद इस हफ्ते होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आवाजाही फिर शुरू हो गई है, लेकिन दुनिया अभी भी तेल संकट से उबर नहीं पाई है। एनालिटिक्स फर्म केपलर की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, करीब चार महीने तक चली इस जंग के दौरान वैश्विक बाजार से लगभग 1.15 अरब बैरल तेल की सप्लाई कम हो गई।
स्ट्रेटजिक रिजर्व 1990 के बाद सबसे कम
युद्ध के दौरान मिडिल ईस्ट से तेल आपूर्ति लगभग ठप पड़ गई थी, जिसकी वजह से दुनियाभर के देशों को अपने स्ट्रेटजिक और कमर्शियल रिजर्व से तेल निकालना पड़ा। रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान करीब 19 करोड़ बैरल तेल स्टॉक से बाहर निकाला गया।
इसका सीधा असर यह हुआ कि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के स्ट्रेटजिक रिजर्व साल 1990 के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गए हैं। अमेरिका का इमरजेंसी ऑयल रिजर्व भी 43 साल में सबसे कम हो चुका है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वर्साय में हुई G7 बैठक में कहा कि अगर युद्ध और लंबा खिंचता, तो अमेरिका का रिजर्व महज चार हफ्तों में खाली हो सकता था।
सीजफायर से राहत, लेकिन भरोसा अभी कम
अमेरिका-ईरान समझौते की खबर आते ही तेल बाजार में राहत देखने को मिली। युद्ध के पीक पर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका ब्रेंट क्रूड अब 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है। हालांकि एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिर्फ कीमतों में गिरावट पूरी तस्वीर नहीं बताती।
होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बावजूद सप्लाई चेन तुरंत सामान्य नहीं हो पाएगी। समुद्री रास्तों से बारूदी सुरंगें हटाने, खाली टैंकरों को वापस लाने और उत्पादन बढ़ाने में काफी वक्त लगेगा। उद्योग जगत के जानकारों का अनुमान है कि व्यवस्था पूरी तरह पटरी पर आने में कई महीने लग सकते हैं, और तब तक दुनिया को मौजूदा भंडार के सहारे ही गुजारा करना होगा।
RBC कैपिटल मार्केट्स की कमोडिटी विश्लेषक हेलिमा क्रॉफ्ट के अनुसार, बाजार जरूरत से ज्यादा आशावादी हो गया है और संकट को खत्म मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
कुछ एक्सपर्ट्स को राहत की उम्मीद भी
इंफ्रास्ट्रक्चर केपिटल एडवाइजर्स के सीईओ जे हैटफील्ड का कहना है कि नकदी की तंगी से जूझ रहे कुछ OPEC देश जल्द उत्पादन बढ़ा सकते हैं, जिससे आगे चलकर सप्लाई में सुधार और कीमतों पर दबाव बनने की उम्मीद है।
मैक्वेरी ग्रुप के ग्लोबल ऑयल एंड गैस रणनीतिकार विकास द्विवेदी के मुताबिक, जंग शुरू होने से पहले दुनिया के पास तेल का पर्याप्त भंडार मौजूद था, इसी वजह से इतनी बड़ी सप्लाई बाधित होने के बावजूद बाजार पूरी तरह नहीं डगमगाया। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका में डीजल-पेट्रोल का स्टॉक घटा जरूर है, पर हालात फिलहाल नियंत्रण में हैं। संकट के पीक पर रिफाइनरियों को तेल जुटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी, लेकिन आने वाले हफ्तों में स्थिति पलट सकती है।
विशेषज्ञों की मानें तो जंग के दौरान गायब हुए 1.15 अरब बैरल तेल की भरपाई आसान नहीं होगी। अगर दुनिया रोजाना मांग से 50 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन भी करे, तब भी इस कमी को पाटने में करीब एक साल का समय लग सकता है।
हर दिन 10.3 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन
IEA और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में फिलहाल औसतन हर दिन 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन हो रहा है — यानी हर महीने करीब 309 करोड़ बैरल और साल भर में लगभग 3,760 करोड़ बैरल।
अमेरिका इस समय दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, जो अकेले वैश्विक उत्पादन का करीब 13% हिस्सा देता है। इसके बाद सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक का स्थान आता है। ये पांचों देश मिलकर दुनिया की कुल तेल सप्लाई का करीब 40% हिस्सा पूरा करते हैं — इसलिए इनमें से किसी भी देश में युद्ध, प्रतिबंध या उत्पादन कटौती सीधे वैश्विक बाजार और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर डालती है।

