अच्छी फसल के लिए मिट्टी की जांच जरूरी, सही उपचार और पोषक तत्वों से बढ़ेगा उत्पादन
किसी भी बीमारी का इलाज करने से पहले उसकी जांच की जाती है ताकि समस्या की सही पहचान हो सके। यही सिद्धांत खेती पर भी लागू होता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल की बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच कराना बेहद जरूरी है। मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों, उसकी उर्वरता और संभावित समस्याओं की जानकारी मिलने के बाद ही उचित उपचार और खाद प्रबंधन किया जाना चाहिए। इससे फसल का उत्पादन बढ़ता है और किसानों को बेहतर लाभ प्राप्त होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी की जांच के बिना खेती करना कई बार नुकसान का कारण बन सकता है। यदि मिट्टी में किसी पोषक तत्व की कमी है या उसमें लवणता, क्षारीयता अथवा अन्य कोई समस्या है तो उसका समाधान पहले किया जाना चाहिए। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया जाता है कि खेत में कौन-सी फसल अधिक उपयुक्त रहेगी और किस प्रकार के उर्वरकों की आवश्यकता होगी।

राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टी की प्रकृति अलग-अलग है और उसी के अनुसार फसलों का चयन किया जाना चाहिए। मेवाड़, वागड़ और हाड़ौती क्षेत्र में मुख्य रूप से काली मिट्टी पाई जाती है। यह मिट्टी खेती के लिए अत्यंत उपजाऊ मानी जाती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इन क्षेत्रों में कपास, धान और मक्का जैसी फसलों की बुवाई अधिक लाभदायक रहती है। काली मिट्टी में पौधों के विकास के लिए आवश्यक अधिकांश पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं, जिससे फसल का अच्छा विकास होता है।
इसके विपरीत जोधपुर और भरतपुर क्षेत्र में रेतीली तथा दोमट मिट्टी पाई जाती है, जबकि बीकानेर और जयपुर क्षेत्र में मुख्य रूप से रेतीली मिट्टी होती है। इन क्षेत्रों के लिए मूंग, उड़द, चवला, बाजरा, मोठ, सोयाबीन, मूंगफली और ज्वार जैसी फसलें अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं। ये फसलें कम पानी और हल्की मिट्टी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जोधपुर, भरतपुर, बीकानेर और जयपुर क्षेत्र के भूजल में लवणता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसका सीधा असर मिट्टी की गुणवत्ता पर पड़ता है। इसलिए इन क्षेत्रों में मिट्टी के उपचार और संतुलित पोषण प्रबंधन की आवश्यकता ज्यादा होती है। यहां की मिट्टी में नाइट्रोजन और जिंक जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी भी अक्सर देखी जाती है।
पौधों की वृद्धि और उत्पादन के लिए कई पोषक तत्व आवश्यक होते हैं। नाइट्रोजन (N) पौधों की बढ़वार और हरी पत्तियों के विकास में मदद करती है। फास्फोरस (P) जड़ों को मजबूत बनाता है तथा फूल और फल बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। पोटाश (K) पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके अलावा सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी फसल के समुचित विकास के लिए आवश्यक हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी में जिंक की मात्रा 0.6 पीपीएम और आयरन की मात्रा 4.5 पीपीएम से अधिक होना लाभकारी माना जाता है। यदि इन तत्वों की कमी हो तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञ किसानों को रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग करने से भी बचने की सलाह देते हैं। लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक खाद डालने से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित होती है और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है।
मिट्टी को मुख्य रूप से अम्लीय, क्षारीय और सामान्य श्रेणियों में बांटा जाता है। प्रत्येक प्रकार की मिट्टी के लिए अलग-अलग प्रबंधन और फसल चयन की आवश्यकता होती है। इसलिए खेती की शुरुआत मिट्टी की जांच से करना ही सबसे बेहतर उपाय माना जाता है। इससे किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और अपनी आय में भी वृद्धि कर सकते हैं।

