SCO Summit: बिश्केक में मोदी-पुतिन-शी होंगे आमने-सामने, जानिए क्या है एजेंडा

ट्रंप की एकतरफा नीतियों के बीच बहुध्रुवीय दुनिया की तस्वीर पेश करने की कोशिश, दो दिवसीय सम्मेलन आज से शुरू, संगठन के 25 साल पूरे
SCO Summit: बिश्केक में मोदी-पुतिन-शी होंगे आमने-सामने, जानिए क्या है एजेंडा
बिश्केक (किर्गिस्तान): शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के शीर्ष नेता किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में जुट रहे हैं। इस दो-दिवसीय शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हो रहे हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान भी इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस साल संगठन अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर रहा है, जो इसे और भी खास बनाता है।
यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर हमले के बाद पैदा हुए हालात और लगातार जारी रूस-यूक्रेन युद्ध के असर से जूझ रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या SCO देश इस मंच का इस्तेमाल बहुध्रुवीय दुनिया और ग्लोबल साउथ के व्यापार व सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं, खासकर तब जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा विदेश नीति ने वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया है।
सम्मेलन का थीम और सहभागी देश
इस साल का सम्मेलन “टुगेदर फॉर सस्टेनेबल पीस, डेवलपमेंट एंड प्रॉस्पेरिटी” थीम के तहत आयोजित हो रहा है। शी, पुतिन और मोदी के अलावा पाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, बेलारूस और कज़ाकिस्तान जैसे देशों के नेता भी इसमें शामिल हो रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तईप एर्दोगन, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस और आसियान महासचिव काओ किम हॉर्न के भी सम्मेलन में मौजूद रहने की उम्मीद है।
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के विश्लेषक विलियम यांग के मुताबिक, चल रहे युद्धों ने वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है, और ऐसे में यह सम्मेलन चीन और भारत जैसी उभरती शक्तियों के लिए अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ जुड़ाव गहरा करने का अहम मौका है।
SCO क्या है और इसका इतिहास
SCO की शुरुआत 1996 में “शंघाई फाइव” के नाम से एक सुरक्षा गुट के रूप में हुई थी। इसे चीन, रूस, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान ने शीत युद्ध और सोवियत संघ के विघटन के बाद अपनी सीमा विवादों को सुलझाने के लिए बनाया था। जून 2001 में यह गुट SCO में तब्दील हुआ और उज़्बेकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया। 2017 में भारत और पाकिस्तान इसके सदस्य बने, जबकि ईरान 2023 में और बेलारूस 2024 में इसका हिस्सा बने।
आज SCO सदस्य देश दुनिया की 43 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
किन मुद्दों पर होगी चर्चा
SCO सचिवालय के अनुसार, इस साल के एजेंडे में अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर हमले, रूस-यूक्रेन युद्ध और अफगानिस्तान की आर्थिक-सामाजिक स्थिति जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से शामिल हैं। एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं—भारत और चीन—के बीच रिश्तों पर भी चर्चा होने की संभावना है। बीते साल पाँच वर्षों के तनाव के बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की शुरुआत हुई थी, और मोदी ने 2018 के बाद पहली बार चीन की यात्रा की थी।
भारत-पाकिस्तान सीमा तनाव का मुद्दा भी सम्मेलन में उठने की उम्मीद है। तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के मनोज केवलरमानी के मुताबिक, पारंपरिक सुरक्षा एजेंडे के अलावा इस बार आर्थिक एकीकरण और वित्तीय सहयोग ढांचे पर भी प्रगति हो सकती है। बीते साल तियानजिन सम्मेलन में SCO डेवलपमेंट बैंक बनाने पर सहमति बनी थी, और अब किर्गिज़ नेतृत्व इस बैंक के साथ-साथ SCO डेवलपमेंट फंड और इन्वेस्टमेंट फंड को आगे बढ़ाना चाहता है।
व्यापार मार्गों पर खास ज़ोर
आर्थिक जुड़ाव पर भी खास ज़ोर रहेगा, क्योंकि अमेरिका-इज़राइल युद्ध के चलते होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिसका असर वैश्विक आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा बाज़ार और वित्तीय बाज़ार पर पड़ा है। इस दौरान नए व्यापार गलियारों, जैसे रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से भारत के मुंबई तक ईरान होते हुए बनने वाले 7,200 किलोमीटर लंबे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, पर भी बातचीत हो सकती है।
नेटिक्सिस बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री एलिशिया गार्सिया-हरेरो के मुताबिक, मोदी और पुतिन के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक में नॉर्दर्न सी रूट पर भी चर्चा हो सकती है, जो आर्कटिक तट से होकर गुज़रता है। चीन ने पिछले महीने ही एक नया शिपिंग रूट शुरू करने की घोषणा की थी, ताकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के बीच वैश्विक व्यापार को आसान बनाया जा सके।
क्या सभी मुद्दों पर बन पाएगी सहमति
हालांकि, इस यूरेशियाई गुट के लिए वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों पर सहमति बनाना हमेशा आसान नहीं रहा है। रूस अक्सर यूक्रेन युद्ध को लेकर अधिकतर SCO सदस्यों को अपने पक्ष में लाने में कामयाब रहा है, लेकिन भारत ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है—एक तरफ यूक्रेन के साथ शांति और मज़बूत रिश्तों की बात, तो दूसरी तरफ रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल की खरीद।
इस बार भी यूक्रेन का मुद्दा चर्चा में रह सकता है, क्योंकि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच सम्मेलन के इतर द्विपक्षीय बातचीत होने की उम्मीद है, जिसमें ब्लैक सी की स्थिति पर भी चर्चा हो सकती है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की मौजूदगी को चीन-रूस धुरी से जुड़ने के संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हॉन्गकॉन्ग विश्वविद्यालय के एलेजांद्रो रेयेस के मुताबिक, भारत खुद अपनी SCO प्राथमिकताओं को “सुरक्षा, संपर्क और अवसर” के रूप में परिभाषित करता है, जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के अनुरूप है। भारत मध्य एशिया में अपनी पहुँच बढ़ाना चाहता है, रूस के साथ रक्षा संबंध बनाए रखना चाहता है, और साथ ही चीन के साथ धीरे-धीरे स्थिर हो रहे रिश्तों को संभालना चाहता है—जबकि अमेरिका के साथ क्वाड जैसे मंच से भी जुड़ा रहना चाहता है।
अमेरिका के लिए क्या मायने
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्लोबल साउथ के गठबंधनों, विशेष रूप से ब्रिक्स, को “अमेरिका-विरोधी” करार दिया है। हालांकि केवलरमानी के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने मध्य एशियाई देशों के साथ भी जुड़ाव बढ़ाया है—नवंबर 2025 में ट्रंप ने इन देशों के नेताओं की वॉशिंगटन में मेज़बानी भी की थी।
गार्सिया-हरेरो के मुताबिक, अमेरिका के लिए यह सम्मेलन एक याद दिलाने वाला मौका है कि भारत जैसे देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेंगे—एक तरफ क्वाड में भागीदारी और अमेरिकी रक्षा उपकरणों की खरीद, तो दूसरी तरफ मॉस्को और बीजिंग-प्रधान मंच से भी संवाद।
रेयेस ने आगाह किया कि अमेरिका को SCO को एक एकजुट अमेरिका-विरोधी गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहिए, भले ही चीन, रूस और ईरान इसके सदस्य हों, क्योंकि चीन, रूस और भारत के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि यह लेबल सही नहीं बैठता।
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