SC का फैसला BCI पर क्या है?
SC का फैसला BCI पर लॉ स्टूडेंट्स से जुड़े एक अहम विवाद में आया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी छात्र के आचरण को लेकर कार्रवाई करने का अधिकार संबंधित यूनिवर्सिटी या शैक्षणिक संस्थान के पास होता है।
यह मामला हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law के 2026 बैच के छात्रों से जुड़ा है। छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। विवाद बढ़ने के बाद BCI ने छात्रों के वकील के रूप में एनरोलमेंट पर रोक लगाने और मामले की जांच के निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI की इस कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI के आदेश को गैरकानूनी बताया
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि Advocates Act, 1961 में BCI या स्टेट बार काउंसिल को लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ इस तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की स्पष्ट या निहित शक्ति नहीं दी गई है।
अदालत ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की ओर से 13 अगस्त को जारी उस आदेश को गैरकानूनी करार दिया, जिसके तहत NALSAR के छात्रों के एनरोलमेंट पर कार्रवाई की गई थी।
मामले में NALSAR के दो पूर्व छात्रों मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि BCI को छात्रों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।
छात्रों के विरोध के अधिकार पर CJI ने क्या कहा था?
मामले की पिछली सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने BCI के हस्तक्षेप पर नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि छात्रों का निर्णय गलत हो सकता है या उन्हें किसी ने गलत सलाह दी हो, लेकिन उन्हें अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार है।
CJI ने यह भी स्पष्ट किया था कि छात्रों और उनके बीच के मामले में BCI का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
इस टिप्पणी के बाद मामले में छात्रों के विरोध के अधिकार और बार काउंसिल की शक्तियों को लेकर बहस और तेज हो गई थी।

NALSAR से शुरू हुआ था विवाद
विवाद की शुरुआत हैदराबाद स्थित NALSAR से हुई थी। यहां बड़ी संख्या में छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को पत्र देकर दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई थी।
बताया गया कि करीब 450 छात्रों ने पत्र लिखकर निमंत्रण वापस लेने की मांग की थी। छात्रों की आपत्ति कथित तौर पर CJI की कुछ टिप्पणियों और दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही को लेकर थी।
मामला बाद में BCI तक पहुंचा। BCI ने NALSAR के 2026 बैच के कुछ छात्रों के वकील के रूप में रजिस्ट्रेशन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। हालांकि बाद में यह कदम वापस लिया गया।
CJI सूर्यकांत की ओर से यह भी कहा गया था कि उन्होंने दीक्षांत समारोह का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था।
TISS का दीक्षांत समारोह भी विवाद में आया
विवाद केवल NALSAR तक सीमित नहीं रहा। मुंबई स्थित Tata Institute of Social Sciences (TISS) का 2 अगस्त को प्रस्तावित 86वां दीक्षांत समारोह भी स्थगित कर दिया गया था।
संस्थान ने इसके पीछे अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला दिया था। हालांकि रिपोर्टों में CJI की मौजूदगी को लेकर संभावित छात्र विरोध की चर्चा सामने आई थी।
बाद में TISS का दीक्षांत समारोह 22 अगस्त को आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर डॉ. सीएस प्रमेश को आमंत्रित किया गया।
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में भी उठा मामला
सोनीपत स्थित O.P. Jindal Global University के 15वें दीक्षांत समारोह में भी CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था।
यह कार्यक्रम 25 जुलाई को आयोजित हुआ, लेकिन CJI इसमें शामिल नहीं हुए। उनकी जगह सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने समारोह की अध्यक्षता की।
इससे पहले और बाद में कुछ अन्य लॉ यूनिवर्सिटीज के छात्रों की ओर से भी CJI को समारोहों में आमंत्रित किए जाने को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं।
बेंगलुरु में भी छात्रों ने जताई आपत्ति
बेंगलुरु स्थित National Law School of India University (NLSIU) के मौजूदा और पूर्व छात्रों ने भी CJI सूर्यकांत और BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई थी।
बताया गया कि विरोध करने वालों में 574 मौजूदा छात्र और 128 पूर्व छात्र शामिल थे। छात्रों ने BCI से NALSAR के छात्रों और शिक्षकों से बिना शर्त माफी मांगने की मांग भी की थी।
इस पूरे विवाद के बीच अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला BCI की शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
CJI सूर्यकांत की टिप्पणियों पर क्यों हुआ विवाद?
पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में CJI सूर्यकांत की कुछ टिप्पणियां भी चर्चा में रहीं। 15 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने कुछ युवा वकीलों और एक्टिविस्टों को लेकर टिप्पणी की थी।
इस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया और कुछ छात्र समूहों में प्रतिक्रिया सामने आई। इसके बाद 16 जुलाई को अभिजीत दीपके नाम से एक सोशल मीडिया पेज बनाया गया, जिसका नाम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ रखा गया। इसी समूह की ओर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किए जाने की बात सामने आई थी।
इसके बाद CJI को विभिन्न लॉ यूनिवर्सिटीज के दीक्षांत समारोहों में आमंत्रित किए जाने को लेकर छात्रों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं।
22 जुलाई की टिप्पणी भी चर्चा में रही
22 जुलाई को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान भी CJI सूर्यकांत की टिप्पणी चर्चा में आई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से छात्रों से जुड़े कुछ वीडियो अदालत के सामने देखने का अनुरोध किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, CJI ने वीडियो देखने में रुचि नहीं होने की बात कही थी और अदालत का समय बर्बाद नहीं करने को कहा था।
इन टिप्पणियों और छात्रों के विरोध के बीच NALSAR का मामला BCI तक पहुंचा और बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
SC का फैसला BCI पर क्यों है महत्वपूर्ण?
SC का फैसला BCI पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने BCI की शक्तियों की सीमा को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने रखी है। कोर्ट के अनुसार, लॉ स्टूडेंट्स के शैक्षणिक या अनुशासनात्मक आचरण से जुड़े मामलों में संबंधित यूनिवर्सिटी या संस्थान की भूमिका अहम है।
इस फैसले से यह संदेश भी जाता है कि किसी छात्र के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले संबंधित संस्था के अधिकार क्षेत्र और लागू कानून को ध्यान में रखना जरूरी है।
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने BCI की ओर से लॉ स्टूडेंट्स के एनरोलमेंट को रोकने की कार्रवाई को कानून के अनुरूप नहीं माना।
मामले की प्रमुख बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने BCI की कार्रवाई पर अहम फैसला दिया।
- BCI को लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार नहीं बताया गया।
- विवाद NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों से जुड़ा था।
- छात्रों ने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था।
- BCI ने छात्रों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने का निर्देश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने BCI के 13 अगस्त के आदेश को गैरकानूनी बताया।
- कोर्ट ने कहा कि छात्रों के आचरण पर कार्रवाई का अधिकार संबंधित यूनिवर्सिटी के पास है।
- मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की।
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