Supreme Court Live Streaming Rules: बिना अनुमति कोर्ट की रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर सकेंगे, सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश

देश की सर्वोच्च अदालत ने Supreme Court Live Streaming Rules को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की लाइव-स्ट्रीम रिकॉर्डिंग का उपयोग बिना पूर्व अनुमति नहीं किया जा सकेगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया, YouTube या किसी अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड, शेयर, रीपोस्ट, एडिट या उससे आर्थिक लाभ (Monetization) कमाने की अनुमति नहीं होगी, जब तक संबंधित अदालत से औपचारिक मंजूरी प्राप्त न हो।
यह आदेश न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता, गरिमा और रिकॉर्डिंग के संभावित दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से जारी किया गया है।
Supreme Court Live Streaming Rules में क्या कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अदालत की लाइव-स्ट्रीम रिकॉर्डिंग का उपयोग करने से पहले संबंधित न्यायालय की अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
निर्देशों के अनुसार—
- सुप्रीम कोर्ट की रिकॉर्डिंग के लिए सेक्रेटरी जनरल की अनुमति आवश्यक होगी।
- हाई कोर्ट की रिकॉर्डिंग के लिए संबंधित रजिस्ट्रार जनरल की मंजूरी लेनी होगी।
बिना अनुमति रिकॉर्डिंग को किसी भी डिजिटल माध्यम पर प्रकाशित करना नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
किन गतिविधियों पर लगाई गई रोक?
Supreme Court Live Streaming Rules के तहत निम्न कार्यों पर प्रतिबंध लगाया गया है—
- लाइव-स्ट्रीम रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना।
- YouTube या अन्य प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना।
- वीडियो या ऑडियो को एडिट करना।
- रिकॉर्डिंग का कोई हिस्सा अलग संदर्भ में प्रस्तुत करना।
- रिकॉर्डिंग से कमाई (Monetization) करना।
- बिना अनुमति रीपोस्ट या शेयर करना।
अदालत का मानना है कि संपादित या अधूरी रिकॉर्डिंग से न्यायिक प्रक्रिया के बारे में गलत धारणा बन सकती है।
मीडिया रिपोर्टिंग पर क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश केवल ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर लागू होगा।
समाचार संस्थान पहले की तरह अदालत की कार्यवाही पर समाचार प्रकाशित और प्रसारित कर सकेंगे। यानी पत्रकारिता और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पर इस आदेश का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
आदेश क्यों जारी किया गया?
यह निर्देश उस याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया जिसमें मांग की गई थी कि अदालत की रिकॉर्डिंग का बिना अनुमति उपयोग रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
याचिका में यह भी कहा गया था कि कई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अदालत की रिकॉर्डिंग का संपादित रूप में उपयोग किया जा रहा है और उससे आर्थिक लाभ भी कमाया जा रहा है।
केंद्र और राज्यों से क्या कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अदालत ने पूछा है कि—
- रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या कानूनी व्यवस्था है?
- भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जा सकते हैं?
सरकारों से इस संबंध में विस्तृत जवाब मांगा गया है।
न्यायिक गरिमा बनाए रखने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
यदि रिकॉर्डिंग को काट-छांटकर या संदर्भ बदलकर प्रस्तुत किया जाता है तो—
- लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
- न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि प्रभावित हो सकती है।
- न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को नुकसान पहुंच सकता है।
इसी कारण अदालत ने अनुमति आधारित व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता बताई।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि कोई व्यक्ति या संस्था अदालत की लाइव-स्ट्रीम रिकॉर्डिंग का उपयोग करना चाहती है तो पहले संबंधित न्यायालय से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
बिना मंजूरी—
- वीडियो डाउनलोड करना,
- सोशल मीडिया पर पोस्ट करना,
- YouTube चैनल पर अपलोड करना,
- या उससे विज्ञापन आय प्राप्त करना,
नियमों के विरुद्ध माना जाएगा।
Supreme Court Live Streaming Rules न्यायिक रिकॉर्डिंग के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लाइव-स्ट्रीम रिकॉर्डिंग का उपयोग केवल निर्धारित अनुमति प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकेगा। साथ ही समाचार रिपोर्टिंग को इससे अलग रखा गया है ताकि मीडिया स्वतंत्र रूप से अदालत की कार्यवाही की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग जारी रख सके।

