SMS मेडिकल कॉलेज में रिटायर्ड फैकल्टी की पुनर्नियुक्ति पर बढ़ा विवाद, जूनियर फैकल्टी में रोष
जयपुर स्थित सवाई मानसिंह (SMS) मेडिकल कॉलेज और उससे संबद्ध एसएमएस अस्पताल में इन दिनों फैकल्टी पदों को लेकर अंदरूनी तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। विवाद का केंद्र रिटायर हो चुके वरिष्ठ प्रोफेसरों की पुनर्नियुक्ति और उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद दिए जाने की प्रक्रिया बनी हुई है। मेडिकल कॉलेज में जूनियर और सीनियर फैकल्टी के बीच बढ़ती खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है।

जानकारी के अनुसार, कई वरिष्ठ प्रोफेसर रिटायरमेंट के बाद ‘पे-माइनस पेंशन’ व्यवस्था के तहत दोबारा सेवाएं दे रहे हैं। हालांकि कॉलेज के भीतर यह चर्चा तेज है कि ऐसे कई वरिष्ठ प्रोफेसर शिक्षण और शोध गतिविधियों की बजाय यूनिट हेड और विभागाध्यक्ष (एचओडी) जैसे प्रशासनिक पदों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इससे उन जूनियर फैकल्टी सदस्यों में नाराजगी बढ़ रही है, जो वर्षों से प्रमोशन और नेतृत्व पदों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हाल ही में नेफ्रोलॉजी विभाग में ऐसा ही एक मामला सामने आया है। विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. धनंजय अग्रवाल हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। अब उन्हें पुनः नियुक्त करने की तैयारी चल रही है। सूत्रों के अनुसार, केवल पुनर्नियुक्ति ही नहीं बल्कि उन्हें यूनिट हेड और विभागाध्यक्ष का दायित्व भी सौंपे जाने पर विचार किया जा रहा है। इस संभावित निर्णय ने विभाग के अन्य फैकल्टी सदस्यों में असंतोष पैदा कर दिया है।
विभाग के कई शिक्षकों का मानना है कि यदि रिटायर हो चुके अधिकारियों को दोबारा नेतृत्व पद दिए जाते रहेंगे तो युवा और कार्यरत फैकल्टी सदस्यों के करियर विकास पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उनका कहना है कि लंबे समय से विभाग में कार्य कर रहे और वरिष्ठता सूची में आगे बढ़ चुके डॉक्टरों को नेतृत्व का अवसर मिलना चाहिए। इससे नई सोच और नई कार्यशैली को भी बढ़ावा मिलेगा।
यह पहला अवसर नहीं है जब एसएमएस मेडिकल कॉलेज में इस प्रकार का विवाद सामने आया हो। इससे पहले एनेस्थीसिया विभाग और कार्डियोलॉजी विभाग में भी रिटायर प्रोफेसरों की पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। उन मामलों में भी जूनियर फैकल्टी ने यह सवाल उठाया था कि जब विभागों में योग्य और अनुभवी कार्यरत शिक्षक मौजूद हैं तो रिटायर अधिकारियों को फिर से महत्वपूर्ण पद क्यों दिए जा रहे हैं।
फैकल्टी सदस्यों का तर्क है कि पुनर्नियुक्ति का उद्देश्य विशेषज्ञता और अनुभव का लाभ उठाना होना चाहिए, लेकिन यदि पुनर्नियुक्त प्रोफेसरों को प्रशासनिक नियंत्रण और नेतृत्व की जिम्मेदारी दी जाती है तो इससे पदोन्नति की स्वाभाविक प्रक्रिया प्रभावित होती है। कई शिक्षकों का मानना है कि इससे संस्थान में कार्यरत युवा डॉक्टरों का मनोबल भी प्रभावित हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर पुनर्नियुक्ति के समर्थकों का कहना है कि अनुभवी प्रोफेसरों की विशेषज्ञता मेडिकल शिक्षा और मरीजों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनका मानना है कि वर्षों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ चिकित्सकों का मार्गदर्शन संस्थान के लिए लाभदायक हो सकता है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि विशेषज्ञता का लाभ सलाहकार या अकादमिक भूमिका में लिया जा सकता है, लेकिन नेतृत्व पदों पर कार्यरत फैकल्टी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इस पूरे मामले ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन के सामने संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर अनुभवी वरिष्ठ प्रोफेसरों की सेवाओं का लाभ लेने की आवश्यकता है तो दूसरी ओर कार्यरत फैकल्टी की पदोन्नति और नेतृत्व के अवसरों को भी सुनिश्चित करना जरूरी है।
फिलहाल नेफ्रोलॉजी विभाग में प्रस्तावित पुनर्नियुक्ति और संभावित एचओडी नियुक्ति को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कॉलेज प्रशासन की ओर से अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल कॉलेजों में रिटायरमेंट के बाद पुनर्नियुक्ति और नेतृत्व पदों के वितरण को लेकर एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है।

