Rajasthan Updates : दस्तावेज पेश न करने पर केस खारिज करना गलत, राजस्थान हाईकोर्ट ने 23 साल पुराना मुकदमा बहाल किया
Rajasthan Updates : राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि दस्तावेज पेश न करने पर दीवानी मुकदमा खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ‘डिस्कवरी’ और ‘प्रोडक्शन’ ऑफ डॉक्यूमेंट्स के कानूनी अंतर को स्पष्ट करते हुए 2003 के जमीन विवाद से जुड़े मुकदमे को बहाल कर ट्रायल कोर्ट को सुनवाई दोबारा शुरू करने के निर्देश दिए।
Rajasthan Updates : दस्तावेज पेश न करने पर केस खारिज करना गलत
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में कहा है कि केवल दस्तावेज पेश न करने के आधार पर किसी दीवानी मुकदमे को खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस संदीप शाह की एकल पीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि कानून में ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ और ‘प्रोडक्शन ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं और दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने हनुमानगढ़ जिले के भाद्रा निवासी ओमप्रकाश और अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 3 सितंबर 2008 को दिया गया मुकदमा खारिज करने का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले की सुनवाई उसी स्थिति से दोबारा शुरू करे जहां से मुकदमा खारिज किया गया था।
23 साल पुराना है जमीन से जुड़ा विवाद
यह मामला वर्ष 2003 का है और जमीन के एक सौदे से जुड़ा हुआ है। अपीलकर्ता स्वर्गीय ओमप्रकाश, ललिता देवी और दीपक कुमार सहित अन्य लोगों ने भाद्रा निवासी बलवंत, भूपसिंह और अन्य के खिलाफ मुकदमा दायर किया था।
वादियों का आरोप था कि प्रतिवादियों के साथ 6.30 लाख रुपए में जमीन का सौदा तय हुआ था, लेकिन बाद में प्रतिवादियों ने इस समझौते का पालन नहीं किया। इसी को लेकर अदालत में मुकदमा दायर किया गया था।
दूसरी ओर प्रतिवादियों के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि जमीन बेचने का कोई समझौता नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि वादी ने केवल 1.10 लाख रुपए का कर्ज दिया था और अब धोखाधड़ी के जरिए जमीन पर दावा करने की कोशिश की जा रही है।
ट्रायल कोर्ट ने मांगे थे पुराने बही-खाते
मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने ट्रायल कोर्ट में एक आवेदन दायर किया था। इसमें वादी पक्ष से वर्ष 1999 से 2001 तक के मूल बही-खाते पेश करने की मांग की गई थी।
भाद्रा कोर्ट ने 23 मार्च 2006 को वादी को आदेश दिया कि वह संबंधित बही-खाते अदालत में प्रस्तुत करें। इस पर वादी पक्ष ने अदालत को बताया कि मूल बही-खाते उनके पिता के पास गांव नेठराणा में हैं और उनके पास केवल वही दस्तावेज उपलब्ध हैं जो उन्होंने अदालत में पेश कर दिए हैं।
हालांकि अदालत के आदेश की पूरी तरह पालना नहीं होने के कारण एडीजे कोर्ट ने 3 सितंबर 2008 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 21(1) के तहत वादी का पूरा मुकदमा ही खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को वादी पक्ष ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील में यह तर्क दिया गया कि अदालत ने केवल दस्तावेज पेश न करने के आधार पर पूरा मुकदमा खारिज कर दिया, जो कानूनन उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सिविल प्रक्रिया संहिता के संबंधित प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया और यह स्पष्ट किया कि अदालतों को ऐसे मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
डिस्कवरी और प्रोडक्शन दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ और ‘प्रोडक्शन ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ कानून में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 21(1) के तहत मुकदमा खारिज करने या बचाव समाप्त करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही की जा सकती है।
यह कार्रवाई तब ही संभव है जब आदेश 11 के नियम 11 (प्रश्नावली), नियम 12 (दस्तावेजों की खोज) या नियम 15 (निरीक्षण) का उल्लंघन किया गया हो।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम 14, जो दस्तावेज पेश करने से संबंधित है, इस दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में नहीं आता।
दुर्लभतम मामलों में ही खारिज हो सकता है दावा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि किसी पक्षकार के दावे को खारिज करना एक गंभीर कार्रवाई है और इसे केवल ‘दुर्लभतम मामलों’ में ही किया जाना चाहिए।
ऐसी कार्रवाई तभी की जानी चाहिए जब यह साबित हो जाए कि संबंधित पक्षकार ने जानबूझकर अदालत के आदेश की अवहेलना की है।
कोर्ट ने कहा कि न्याय का उद्देश्य मामलों का निष्पक्ष निपटारा करना है, न कि तकनीकी कारणों से किसी पक्ष को सुनवाई से वंचित करना।
2008 की स्थिति से दोबारा शुरू होगा ट्रायल
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस मुकदमे की सुनवाई 3 सितंबर 2008 की स्थिति से दोबारा शुरू करे। चूंकि यह मामला वर्ष 2003 से लंबित है, इसलिए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को जल्द सुनवाई पूरी करने के निर्देश भी दिए हैं।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिवादी चाहें तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत सेकेंडरी एविडेंस पेश करने या अदालत से प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए उचित आवेदन कर सकते हैं।
फैसले से स्पष्ट हुआ कानून का महत्वपूर्ण सिद्धांत
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि अदालतों को केवल दस्तावेज पेश न करने के आधार पर किसी मुकदमे को खारिज नहीं करना चाहिए।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायालयों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है और इससे दीवानी मामलों की सुनवाई में कानूनी प्रक्रिया की स्पष्टता भी बढ़ेगी।

