One Nation One Election: ये हैं संविधान के वे 4 अनुच्छेद, जिन्हें बदले बिना नहीं हो सकता ‘एक देश, एक चुनाव’

One Nation One Election:संसद का मानसून सत्र इस बार 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा,
One Nation One Election लागू करने के लिए किन अनुच्छेदों में बदलाव जरूरी?
इस दौरान सरकार कई अहम विधेयक सदन में रखने की योजना बना रही है. इन्हीं में से एक विषय है — ‘
One Nation One Election’, यानी लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराने की व्यवस्था. यह मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से लगातार सुर्खियों में रहा है और सरकार इसे लागू करने के लिए जरूरी कानूनी ढांचा तैयार करने में जुटी है.
लेकिन जितना यह विचार सुनने में आसान लगता है, उसे व्यावहारिक रूप देना उतना ही जटिल है. दरअसल भारत के संविधान में कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं जो देश की चुनावी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रीढ़ माने जाते हैं, और इन्हें संशोधित किए बिना पूरे देश में एक साथ मतदान कराना संभव ही नहीं है. आइए समझते हैं कि वे कौन से चार बड़े अनुच्छेद हैं, जिनमें बदलाव करना ‘एक देश, एक चुनाव’ को हकीकत बनाने के लिए अनिवार्य होगा.
अनुच्छेद 83 — संसद के कार्यकाल का सवाल
इस पूरी बहस की शुरुआत होती है संविधान के अनुच्छेद 83 से. यह अनुच्छेद लोकसभा और राज्यसभा, यानी संसद के दोनों सदनों की समय-सीमा तय करता है. वर्तमान व्यवस्था के तहत लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से पूरे पांच साल के लिए निर्धारित होता है.
अगर देश में सभी चुनाव एक साथ कराने हैं, तो इस पांच साल की सीमा में लोच लानी होगी. इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार को एक ऐसा प्रावधान जोड़ना होगा जिससे जरूरत पड़ने पर लोकसभा का कार्यकाल तय समय से पहले समाप्त किया जा सके, या किसी विशेष परिस्थिति में उसे थोड़े समय के लिए बढ़ाया भी जा सके. बिना इस लचीलेपन के, अलग-अलग समय पर बने सदनों को एक साझा चुनावी चक्र में लाना मुमकिन नहीं होगा.
अनुच्छेद 85 — सरकार गिरने की स्थिति में क्या होगा
दूसरी बड़ी अड़चन अनुच्छेद 85 से जुड़ी है. यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे समय-समय पर संसद के सत्र आहूत करें, और प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा को भंग कर सकें.
यहां असली सवाल यह है — अगर देश में एक साथ चुनाव करा भी लिए जाएं, लेकिन बीच में ही, मान लीजिए दो साल बाद, केंद्र सरकार बहुमत खो दे या गिर जाए, तो आगे क्या होगा? मौजूदा अनुच्छेद 85 में इस स्थिति का कोई स्पष्ट हल नहीं है जो नई व्यवस्था के साथ मेल खाता हो. इसलिए इसमें यह नया प्रावधान जोड़ना जरूरी होगा कि यदि लोकसभा समय से पहले भंग होती है, तो जो नई सरकार बनेगी वह सिर्फ बचे हुए कार्यकाल के लिए ही अस्तित्व में रहेगी, ताकि पूरा चुनावी चक्र फिर से न बिगड़े.
अनुच्छेद 172 — राज्यों की विधानसभाओं का पेच
तीसरी चुनौती केंद्र से आगे बढ़कर राज्यों तक पहुंचती है, और यह अनुच्छेद 172 में निहित है. जिस तरह अनुच्छेद 83 लोकसभा के कार्यकाल को नियंत्रित करता है, ठीक उसी तरह अनुच्छेद 172 देश के हर राज्य की विधानसभा का कार्यकाल पांच साल तय करता है.
‘एक देश, एक चुनाव’ को सफल बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल एक ही तारीख पर समाप्त हो, ताकि लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्यों में भी मतदान एक साथ हो सके. इसका अर्थ यह है कि इस अनुच्छेद में संशोधन करके केंद्र सरकार को यह अधिकार देना होगा कि वह जरूरत पड़ने पर देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को एक साथ घटा या बढ़ा सके. यह तकनीकी रूप से सबसे पेचीदा हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इसमें अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग चुनावी कैलेंडर को एक सूत्र में बांधना पड़ेगा.
अनुच्छेद 174 — राज्यपाल की शक्तियों में बदलाव
चौथा और बेहद अहम पड़ाव है अनुच्छेद 174, जो राज्यों के राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वे समय से पहले विधानसभा को भंग कर सकें. फिलहाल अगर किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता आती है और वहां की सरकार गिर जाती है, तो राज्यपाल इसी अनुच्छेद के तहत विधानसभा भंग करने का फैसला लेते हैं.
नई व्यवस्था में इस प्रावधान को भी बदलना होगा, ताकि किसी एक राज्य में मनमाने ढंग से अलग समय पर चुनाव न हो सकें. इसके बदले यह सुनिश्चित करना होगा कि यदि किसी वजह से किसी राज्य की सरकार बीच में गिरती भी है, तो वहां तुरंत अलग चुनाव कराने के बजाय पूरे देश के साथ ही अगला मतदान कराया जाए. बिना इस बदलाव के, एक भी राज्य में जल्दी चुनाव की नौबत पूरी योजना को पटरी से उतार सकती है.
अनुच्छेद 356 — राष्ट्रपति शासन के बाद की स्थिति
इन चार प्रमुख अनुच्छेदों के अलावा एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिसका सीधा संबंध अनुच्छेद 356 से है. यही वह अनुच्छेद है जिसके तहत किसी राज्य में सरकार के विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है.
‘एक देश, एक चुनाव’ की व्यवस्था तब तक अधूरी रहेगी जब तक यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि राष्ट्रपति शासन लगने के बाद उस राज्य में दोबारा चुनाव कब कराए जाएंगे और नई बनने वाली सरकार का कार्यकाल कितना होगा. अगर यह तय नहीं किया गया, तो राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों में चुनावी चक्र बाकी देश से अलग हो सकता है, जो पूरी योजना के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ होगा.
One Nation One Election: क्यों जरूरी है इन अनुच्छेदों में बदलाव
इन पांचों अनुच्छेदों को देखकर यह साफ हो जाता है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत के संवैधानिक ढांचे में गहरे बदलाव की मांग करता है. लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़े नियम, राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियां, और राष्ट्रपति शासन के बाद की प्रक्रिया — इन सबको एक साझा चुनावी कैलेंडर के अनुरूप ढालना होगा.
इसके लिए संसद में संविधान संशोधन विधेयक लाना होगा, जिसे पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत पड़ेगी. यही वजह है कि सरकार इस दिशा में सतर्कता से आगे बढ़ रही है, और मानसून सत्र में इस विषय पर चर्चा या विधेयक पेश होने की संभावनाओं पर सभी की निगाहें टिकी हैं. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन संवैधानिक चुनौतियों से कैसे निपटती है और इस ऐतिहासिक बद
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