Kasganj: गर्भावस्था में बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियां, समय पर जांच और सही पोषण से मां-शिशु रह सकते हैं सुरक्षित
Kasganj। गर्भावस्था महिलाओं के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील चरण माना जाता है। इस दौरान मां के स्वास्थ्य का सीधा प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल, संतुलित पोषण और नियमित चिकित्सकीय जांच नहीं कराई जाए तो कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। वर्तमान समय में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया, गर्भकालीन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, प्री-एक्लेम्पसिया तथा पोषण संबंधी समस्याओं के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं, जो मां और शिशु दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर को सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक पोषण और विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। पर्याप्त आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की कमी होने पर एनीमिया यानी खून की कमी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। एनीमिया गर्भवती महिलाओं में सबसे आम समस्याओं में से एक है, जो समय से पहले प्रसव, नवजात शिशु के कम वजन और प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकती है।
इसके अलावा गर्भकालीन मधुमेह और उच्च रक्तचाप भी स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। यदि इन बीमारियों की समय पर पहचान और उपचार नहीं किया जाए तो गर्भस्थ शिशु के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कई मामलों में मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा भी हो सकता है। इसलिए चिकित्सक नियमित रूप से ब्लड शुगर और रक्तचाप की जांच कराने की सलाह देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था की पुष्टि होते ही महिला को निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर अपना पंजीकरण कराना चाहिए। इसके बाद नियमित प्रसव पूर्व जांच यानी एएनसी (एंटी नेटल चेकअप) कराना अत्यंत आवश्यक है। एएनसी जांच के दौरान गर्भवती महिला के रक्तचाप, हीमोग्लोबिन स्तर, वजन, ब्लड शुगर तथा गर्भस्थ शिशु के विकास की निगरानी की जाती है। स्वास्थ्य विभाग कम से कम चार अनिवार्य प्रसव पूर्व जांच कराने पर विशेष जोर देता है।
स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार आयरन-फोलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियों का नियमित सेवन करना चाहिए। साथ ही अपने दैनिक आहार में हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, दूध, दही, मौसमी फल और प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना भी गर्भावस्था के दौरान बेहद जरूरी है।
जिला चिकित्सालय की महिला चिकित्सक डॉ. अंजू यादव ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणाम दे सकती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को कमजोरी, चक्कर आना, हाथ-पैरों में सूजन, तेज सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना अथवा ब्लड शुगर से संबंधित लक्षण महसूस होने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। समय पर उपचार मिलने से अधिकांश जटिलताओं से बचा जा सकता है।
डॉ. यादव ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान चार महत्वपूर्ण अल्ट्रासाउंड कराना आवश्यक होता है। इनमें पहला डेटिंग स्कैन, दूसरा तीन महीने के आसपास किया जाने वाला बाय-नर्ब स्कैन, तीसरा पांचवें महीने में एनोमली स्कैन तथा चौथा ग्रोथ स्कैन शामिल है। इन जांचों के माध्यम से गर्भस्थ शिशु के विकास की निगरानी की जाती है और किसी भी संभावित समस्या का समय रहते पता लगाया जा सकता है।
स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती महिलाओं से संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता देने और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ उठाने की अपील की है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निःशुल्क जांच, आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां, आवश्यक टीकाकरण और विशेषज्ञ परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित चिकित्सा परामर्श और जागरूकता के माध्यम से मां और शिशु दोनों को स्वस्थ एवं सुरक्षित रखा जा सकता है।

