व्हाट्सएप डीपी बदलकर 5.30 करोड़ की साइबर ठगी, राजस्थान पुलिस ने पुणे से आरोपी दबोचा
व्हाट्सएप राजस्थान पुलिस की स्टेट साइबर क्राइम शाखा ने कॉर्पोरेट कंपनियों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की साइबर ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस मामले में महाराष्ट्र के पुणे से एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। साइबर अपराधियों ने एक प्रतिष्ठित कंपनी के चेयरमैन की व्हाट्सएप प्रोफाइल फोटो (डीपी) और नाम का दुरुपयोग कर कंपनी के अकाउंटेंट को झांसे में लिया और दो अलग-अलग बैंक खातों में कुल 5 करोड़ 30 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए।
अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (साइबर क्राइम) विजय कुमार सिंह ने बताया कि तकनीकी और वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करते हुए बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब पूरे गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी हुई है।

पुलिस के अनुसार, 27 अप्रैल 2026 को गैलेक्सी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड की ओर से परिवादी दीपेंद्र सिंह ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि साइबर ठगों ने कंपनी के चेयरमैन दीपेंद्र सिंह राठौड़ के नाम और फोटो का इस्तेमाल करते हुए एक नए व्हाट्सएप नंबर से कंपनी के अकाउंटेंट से संपर्क किया। अपराधियों ने खुद को कंपनी का मालिक बताते हुए दो बैंक खातों की जानकारी भेजी और अत्यंत जरूरी भुगतान का हवाला देकर तत्काल राशि ट्रांसफर करने के निर्देश दिए।
व्हाट्सएप पर बॉस का नाम और प्रोफाइल फोटो देखकर अकाउंटेंट को किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। उसने निर्देशों को वास्तविक मानते हुए दोनों खातों में कुल 5.30 करोड़ रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए। बाद में जब कंपनी स्तर पर भुगतान की पुष्टि की गई, तब साइबर ठगी का खुलासा हुआ और तुरंत इसकी शिकायत दर्ज कराई गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, जयपुर की विशेष टीम का गठन किया गया। पुलिस ने ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन का गहन तकनीकी विश्लेषण किया। जांच के दौरान राहुल अशोक (32) निवासी पुणे, महाराष्ट्र की भूमिका सामने आई। राजस्थान पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस के सहयोग से आरोपी को पुणे से गिरफ्तार किया और ट्रांजिट रिमांड पर जयपुर लेकर आई।
पूछताछ में आरोपी राहुल ने स्वीकार किया कि वह मुख्य साइबर अपराधियों को मोटे कमीशन के बदले बैंक खाते उपलब्ध कराता था और अवैध धनराशि के लेनदेन में उनकी मदद करता था। जांच में सामने आया कि राहुल पेशे से दिहाड़ी मजदूर है। उसने पुणे निवासी अमित सिंह के कहने पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एक फर्जी फर्म रजिस्टर करवाई थी, जिसके नाम पर बैंक में करंट अकाउंट खुलवाया गया।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि इस फर्जी फर्म के नाम पर खोले गए करंट अकाउंट की क्रेडिट लिमिट कथित मिलीभगत से 50 करोड़ रुपये तक बढ़वा दी गई थी। इसी खाते का इस्तेमाल मार्च 2026 में हुई 5.30 करोड़ रुपये की साइबर ठगी में किया गया। आरोपी ने गिरोह के लिए तीन अन्य बैंक खाते भी खुलवा रखे थे। ठगी की रकम खाते में आते ही उसे तुरंत कई अन्य खातों में ट्रांसफर कर लेयरिंग की जाती थी, ताकि धन के वास्तविक स्रोत को छिपाया जा सके और जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके।
राजस्थान पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि फर्जी फर्म के नाम पर खाते खोलने और 50 करोड़ रुपये की लिमिट मंजूर कराने में किसी बैंक अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका रही या नहीं। यदि जांच में किसी बैंक कर्मी की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस ने बताया कि मामले में इस्तेमाल किए गए अन्य बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल साक्ष्यों की भी जांच जारी है। मुख्य आरोपी अमित सिंह सहित पूरे साइबर गिरोह की पहचान कर जल्द गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं। यह कार्रवाई उप महानिरीक्षक पुलिस (साइबर क्राइम) शांतनु कुमार सिंह के निर्देशन, पुलिस अधीक्षक सुमित मेहरड़ा के सुपरविजन तथा स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, जयपुर के थानाधिकारी एवं उपाधीक्षक पुलिस गजेंद्र शर्मा के नेतृत्व में गठित विशेष टीम ने की। टीम में पुलिस निरीक्षक मुकेश, कांस्टेबल अमित कुमार और कांस्टेबल जयसिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि साइबर अपराधी अब सोशल इंजीनियरिंग और पहचान की नकल कर बड़ी कंपनियों को भी निशाना बना रहे हैं, इसलिए किसी भी वित्तीय लेनदेन से पहले स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना बेहद आवश्यक है।

