पगारे घाट पुल: वर्षों से अधूरी मांग, बरसात में नाव के सहारे जिंदगी, खतरे में हजारों ग्रामीण

पगारे घाट पुल उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हजारों ग्रामीणों के लिए आज भी सिर्फ एक सपना बना हुआ है। हर साल बरसात आते ही कुआनो नदी का जलस्तर बढ़ जाता है और गांवों को जोड़ने वाला अस्थायी लकड़ी का पुल बह जाता है। इसके बाद स्कूली बच्चों, किसानों, मरीजों और आम लोगों को नाव के सहारे नदी पार करनी पड़ती है। वर्षों से स्थायी पुल निर्माण की मांग होने के बावजूद अब तक यह परियोजना धरातल पर नहीं उतर सकी है।
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दौरान पुल निर्माण के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी ठंडे बस्ते में चला जाता है। परिणामस्वरूप हजारों लोगों को हर मानसून में जोखिम उठाकर आवागमन करना पड़ता है।
क्या है पगारे घाट पुल का पूरा मामला?
बस्ती जिले के रामनगर विकास खंड की नरकटहा ग्राम पंचायत स्थित कुआनो नदी पर पगारे घाट वर्षों से दो विकास खंडों के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यहां स्थायी पुल नहीं होने के कारण हर वर्ष बरसात शुरू होने से पहले ग्रामीण अपने स्तर पर लकड़ी का अस्थायी पुल तैयार करते हैं। इस पुल के जरिए साइकिल और बाइक की आवाजाही होती है।
लेकिन जैसे ही नदी में तेज बहाव आता है, यह पुल बह जाता है और पूरा इलाका नाव के भरोसे रह जाता है।
पगारे घाट पुल नहीं बनने से किन लोगों को हो रही सबसे ज्यादा परेशानी?
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 10 हजार लोग आवागमन करते हैं।
इनमें शामिल हैं—
- स्कूली छात्र-छात्राएं
- किसान
- मजदूर
- व्यापारी
- मरीज
- महिलाएं एवं बुजुर्ग
बरसात के दौरान सबसे अधिक दिक्कत बच्चों को होती है, जिन्हें गौर और बभनान के विद्यालयों तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है।
अभिभावकों का कहना है कि हर दिन बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है।
परिवहन पर भी पड़ रहा बड़ा असर
पगारे घाट पुल नहीं बनने का असर केवल पैदल यात्रियों तक सीमित नहीं है।
ग्रामीण बताते हैं कि—
- जहां सीधी दूरी लगभग 6 किलोमीटर है,
- वहीं पुल न होने के कारण चार पहिया वाहनों को करीब 22 किलोमीटर का लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।
इससे—
- ईंधन की खपत बढ़ती है।
- समय की बर्बादी होती है।
- किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
- आपातकालीन सेवाएं भी प्रभावित होती हैं।
वर्षों से उठ रही है पुल निर्माण की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के समक्ष पुल निर्माण की मांग रखी।
उनका आरोप है कि—
- सांसदों को ज्ञापन दिए गए।
- विधायकों से मुलाकात की गई।
- कई बार प्रशासन को आवेदन सौंपे गए।
लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं।
क्या बोले स्थानीय जनप्रतिनिधि?
स्थानीय विधायक अतुल चौधरी ने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को कई बार विधानसभा में उठाया है तथा पुल निर्माण के लिए शासन को पत्र भी भेजे हैं। उनके अनुसार बजट स्वीकृत न होने के कारण निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ पाया।
वहीं विधायक राजेंद्र चौधरी का कहना है कि यह पुल कप्तानगंज और रुधौली विधानसभा क्षेत्रों को जोड़ता है। उन्होंने दावा किया कि पिछले कई वर्षों से पुल निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है।
पगारे घाट पुल बनने से क्या होगा फायदा?
यदि पगारे घाट पुल का निर्माण होता है तो—
- लगभग 10 हजार लोगों को सीधा लाभ मिलेगा।
- दो विकास खंडों के बीच आवागमन आसान होगा।
- बच्चों की शिक्षा सुरक्षित होगी।
- किसानों को बाजार तक पहुंचने में सुविधा मिलेगी।
- मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा।
- ईंधन और समय दोनों की बचत होगी।
- क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को गति मिलेगी।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है—
- पगारे घाट पर स्थायी पुल का तत्काल निर्माण कराया जाए।
- परियोजना के लिए शीघ्र बजट स्वीकृत किया जाए।
- बरसात के दौरान सुरक्षित आवागमन की वैकल्पिक व्यवस्था हो।
- स्कूली बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था की जाए।
- निर्माण कार्य की समय-सीमा सार्वजनिक की जाए।
पगारे घाट पुल केवल एक निर्माण परियोजना नहीं बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत से जुड़ा विषय है। हर मानसून में ग्रामीणों का जीवन जोखिम में पड़ जाता है और बच्चों से लेकर किसानों तक सभी प्रभावित होते हैं। स्थानीय लोग लंबे समय से स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं। अब यह देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस बहुप्रतीक्षित पुल निर्माण को कब तक अमलीजामा पहनाते हैं।

