छह महीने में निवेशकों को बड़ा झटका! सोना 20% और चांदी 43% टूटी, शेयर बाजार भी दबाव में
साल 2026 के पहले छह महीने निवेशकों के लिए काफी उतार-चढ़ाव भरे रहे। जिन निवेशकों ने सुरक्षित निवेश के तौर पर सोना और चांदी खरीदी थी, उन्हें भी इस दौरान बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। वहीं शेयर बाजार में निवेश करने वालों को भी निराशा हाथ लगी। मजबूत अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों ने लगभग सभी प्रमुख निवेश विकल्पों पर दबाव बनाया।
आंकड़ों के अनुसार, 29 जनवरी को अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद सोने की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं चांदी में और भी बड़ी गिरावट देखने को मिली, जो अपने उच्च स्तर से करीब 43 प्रतिशत तक टूट गई। इस तेज गिरावट ने उन निवेशकों को झटका दिया जिन्होंने रिकॉर्ड स्तर के आसपास निवेश किया था।

केवल कीमती धातुएं ही नहीं, बल्कि भारतीय शेयर बाजार भी इस दौरान दबाव में रहा। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स पहले छह महीनों में करीब 11 प्रतिशत नीचे आया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी लगभग 8.6 प्रतिशत गिरा। इससे साफ है कि इस अवधि में लगभग सभी प्रमुख एसेट क्लास में निवेशकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोने और चांदी में आई गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति रही। फेडरल रिजर्व के नए चेयरमैन केविन वॉर्श ने ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाया और जल्द दरों में कटौती के संकेत नहीं दिए। इससे वैश्विक वित्तीय बाजार में डॉलर मजबूत हुआ। जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तब आमतौर पर सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं की मांग कमजोर पड़ जाती है क्योंकि इनकी कीमत डॉलर में तय होती है। यही वजह रही कि सोने और चांदी की कीमतों पर लगातार दबाव बना रहा।
दूसरा बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा सैन्य तनाव रहा। दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई। निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल बना और दुनिया भर के शेयर बाजारों में दबाव देखने को मिला। भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव आया, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका मजबूत हुई। इन परिस्थितियों ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया और शेयर बाजार में बिकवाली बढ़ गई।
हालांकि सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक संकट के दौरान सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार मजबूत डॉलर और ऊंची ब्याज दरों की उम्मीद ने सोने की सुरक्षित निवेश वाली मांग को भी कमजोर कर दिया। यही कारण है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों के बावजूद सोने की कीमतों में तेजी नहीं आ सकी और निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा।
शेयर बाजार में भी विदेशी निवेशकों की रणनीति लगातार बदलती रही। ऊंची ब्याज दरों और डॉलर की मजबूती के कारण विदेशी निवेशकों ने उभरते बाजारों से कुछ हद तक दूरी बनाई। इसका असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिला। कई बड़े सेक्टरों में मुनाफावसूली और कमजोर वैश्विक संकेतों के कारण सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में रहे।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति, वैश्विक महंगाई के आंकड़ों, डॉलर की चाल और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि ब्याज दरों में कटौती के संकेत मिलते हैं और वैश्विक तनाव कम होता है, तो सोने, चांदी और शेयर बाजार तीनों में फिर से सुधार देखने को मिल सकता है।
फिलहाल साल के पहले छह महीने यह संकेत देते हैं कि निवेश के क्षेत्र में केवल एक विकल्प पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। वित्तीय सलाहकार निवेशकों को विविध निवेश रणनीति अपनाने की सलाह दे रहे हैं, ताकि किसी एक एसेट में गिरावट का असर पूरे निवेश पोर्टफोलियो पर न पड़े। आने वाले महीनों में वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम ही तय करेंगे कि बाजार में नई तेजी लौटेगी या उतार-चढ़ाव का दौर आगे भी जारी रहेगा।

