Javed Akhtar @81 Birthday Special : साहसिक बयान, सामाजिक आलोचना और बॉलीवुड की निडर आवाज़
Javed Akhtar के जन्मदिन पर याद करें उनके साहसिक और विवादास्पद विचार। भारत-पाक विभाजन, आरएसएस, बुर्का, सेकुलरिज़्म, लैंगिक हिंसा और बॉलीवुड पर उनकी बेबाक राय ने समाज और संस्कृति में गहन बहस छेड़ी। यह जन्मदिन उनके साहस और स्वतंत्रता का जश्न है।
Javed Akhtar जन्मदिन विशेष: बंटवारा, सेकुलरिज़्म, बुर्का और सामाजिक बहस
जीवन और निडर आवाज़
जावेद अख्तर, बॉलीवुड के महान गीतकार और पटकथा लेखक, ने शोले, दीवार, डॉन, और मिस्टर इंडिया जैसी फिल्मों को अमर संवाद दिए। फिल्मों से बाहर, उनके बेबाक विचार समाज, धर्म और राजनीति पर लगातार सवाल उठाते हैं। जन्मदिन के अवसर पर उनके साहस और समाजिक जागरूकता को याद करना महत्वपूर्ण है।
बंटवारा: ऐतिहासिक भूल
जावेद अख्तर ने भारत-पाक विभाजन को ऐतिहासिक भूल बताया। 2023 में लाहौर के फैज फेस्टिवल में उन्होंने कहा कि दोनों देशों के लोग सांस्कृतिक रूप से जुड़े हैं और विभाजन ने केवल दुश्मनी पैदा की। पाकिस्तान में उनके इस बयान को सराहा गया, जबकि भारत में यह विवादित रहा।
Javed Akhtar : पाकिस्तान में सेकुलरिज़्म पर टिप्पणी
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में धर्मनिरपेक्षता लगभग खत्म हो चुकी है और कट्टरवाद हावी है। अल्पसंख्यकों की स्थिति देखकर स्पष्ट है कि वहां सेकुलरिज़्म खतरे में है।
Javed Akhtar : नास्तिकता और व्यक्तिगत पहचान

जावेद अख्तर ने खुलासा किया कि वे नास्तिक हैं, लेकिन मुस्लिम परिवार में पैदा होने के कारण उनकी पहचान मुस्लिम बनी रही। उन्होंने बताया कि नास्तिक बनना समाज में चुनौतीपूर्ण है और यह स्थिति गे और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसी कठिनाइयों से मिलती-जुलती है।
लाउडस्पीकर पर अजान और सामाजिक जिम्मेदारी
2020 में उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर पर अजान का समय सीमित होना चाहिए। उनका मानना था कि अजान सही है, लेकिन दूसरों के लिए असुविधा नहीं होनी चाहिए। इस बयान ने समाज में धार्मिक प्रथाओं और नागरिक सुविधाओं पर बहस छेड़ी।
धर्म और डरपोकता
अख्तर ने धर्म को अंधेरे युग की उपज बताया और कहा कि धर्म ने इंसान को भयभीत बनाया है। उनका मानना है कि धार्मिक ग्रंथ मानव-निर्मित हैं और इन्हें अंधभक्ति से परे सोचना चाहिए।
उर्दू भाषा और सांस्कृतिक अधिकार
उर्दू को केवल मुस्लिम भाषा बताना बड़ी नाइंसाफी है। जावेद अख्तर ने बताया कि हिंदी और उर्दू कभी एक ही भाषा थीं और ब्रिटिश नीतियों ने इन्हें विभाजित किया। उर्दू भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे किसी एक धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता।

