International News : ग्रीनलैंड विवाद में डेनमार्क फंसा, अमेरिका की धमकी से NATO की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर
International News : ग्रीनलैंड पर अमेरिका की धमकियों से डेनमार्क असहज स्थिति में है। NATO के भीतर ही टकराव की आशंका ने संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1974 के साइप्रस विवाद से जुड़ी 50 साल पुरानी दलील आज डेनमार्क के लिए संकट बन गई है।
International News :ग्रीनलैंड विवाद में डेनमार्क फंसा, दोस्त ही बना चुनौती
डेनमार्क इस समय एक असाधारण और संवेदनशील भू-राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। यह संकट किसी पारंपरिक दुश्मन देश से नहीं, बल्कि उसके सबसे करीबी सहयोगी अमेरिका से जुड़ा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बार-बार ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की सार्वजनिक धमकियां दे चुके हैं, जिससे यूरोप और NATO में हलचल मच गई है।
ग्रीनलैंड आधिकारिक तौर पर डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क की तरह ही NATO का सदस्य भी है। ऐसे में स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि पहली बार NATO के भीतर ही एक सदस्य देश दूसरे सदस्य देश को सैन्य दबाव की धमकी देता नजर आ रहा है।

International News : NATO के भीतर टकराव, नियमों की परीक्षा
NATO की स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खतरे से निपटने के लिए की गई थी। इसके सबसे अहम नियम आर्टिकल-5 के अनुसार—
किसी एक सदस्य देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा।
लेकिन इस नियम में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित है—
अगर हमला NATO के अंदर से ही हो, तो क्या होगा?
ग्रीनलैंड विवाद ने इसी कमजोर कड़ी को उजागर कर दिया है। NATO के नियम यह स्पष्ट नहीं करते कि किसी सदस्य देश द्वारा दूसरे सदस्य पर हमले की स्थिति में संगठन क्या कदम उठाएगा।

International News : 50 साल पुरानी दलील, आज बना संकट
ग्रीस के पूर्व वित्त मंत्री और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री यानिस वारोफाकिस ने सोशल मीडिया पर इस स्थिति को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा—
“यह डेनमार्क के कर्मों का फल है।”
दरअसल, उन्होंने 1974 की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाई, जब ग्रीस और तुर्किये, दोनों NATO सदस्य होने के बावजूद, साइप्रस को लेकर युद्ध की स्थिति में पहुंच गए थे।
उस समय डेनमार्क ने साफ कहा था—
NATO का काम किसी सदस्य देश को दूसरे सदस्य देश से बचाना नहीं है।
आज वही तर्क डेनमार्क के लिए उल्टा पड़ता दिख रहा है।
साइप्रस विवाद: NATO की सबसे बड़ी कमजोरी
साइप्रस का भू-राजनीतिक महत्व
साइप्रस यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट के चौराहे पर स्थित एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से अहम द्वीप है।
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लंबे समय तक ब्रिटिश शासन
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1960 में आजादी
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आबादी में ग्रीक और तुर्की समुदायों का मिश्रण
आजादी के समय—
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80% ग्रीक मूल के लोग
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18% तुर्किये मूल के लोग
तनाव को देखते हुए ग्रीस, तुर्किये और ब्रिटेन को गारंटर देश बनाया गया।
1974: जब NATO मूकदर्शक बना

1974 में ग्रीस की सैन्य सरकार ने साइप्रस को ग्रीस में मिलाने के लिए वहां तख्तापलट करवाया।
इसके जवाब में तुर्किये ने साइप्रस पर हमला कर दिया और—
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द्वीप के 36% हिस्से पर कब्जा कर लिया
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लाखों लोग विस्थापित हुए
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साइप्रस स्थायी रूप से दो हिस्सों में बंट गया
आज—
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दक्षिणी हिस्सा: ग्रीक साइप्रस
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उत्तरी हिस्सा: तुर्की साइप्रस (सिर्फ तुर्किये द्वारा मान्यता प्राप्त)
दोनों के बीच आज भी UN नियंत्रित ग्रीन लाइन मौजूद है।
सबसे अहम बात यह रही कि—
👉 NATO ने कोई सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि दोनों देश उसके सदस्य थे।
ग्रीनलैंड मामला: क्या इतिहास दोहराया जाएगा?
ग्रीनलैंड को भले ही काफी हद तक स्वायत्तता मिली हो, लेकिन—
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उसकी रक्षा और विदेश नीति अभी भी डेनमार्क के हाथ में है
अगर अमेरिका सैन्य कदम उठाता है—
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NATO के पास हस्तक्षेप का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं होगा
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क्योंकि हर सैन्य निर्णय के लिए सर्वसम्मति जरूरी है
और अमेरिका खुद NATO का सबसे ताकतवर सदस्य है।
यूरोप का प्रतीकात्मक समर्थन
डेनमार्क के समर्थन में—
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ब्रिटेन ने 1 सैनिक
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नॉर्वे ने 2 सैनिक भेजे
यह सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था।
हालांकि इससे भी ट्रम्प नाराज हो गए और—
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डेनमार्क के समर्थन में खड़े यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया।
एक्सपर्ट्स की राय: NATO के भविष्य पर खतरा
EU और इंटरनेशनल लॉ एक्सपर्ट स्टीवन ब्लैकमैन के मुताबिक—
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ट्रम्प की धमकी NATO की मूल भावना के खिलाफ है
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NATO का सिद्धांत सदस्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करना है
कुछ विशेषज्ञ यूरोप को सख्त रुख अपनाने की सलाह दे रहे हैं—
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अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सवाल
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अमेरिकी बॉन्ड की खरीद रोकना
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अमेरिकी टेक कंपनियों पर सख्त नियम
लेकिन यूरोप के अंदरूनी मतभेद इतने गहरे हैं कि फिलहाल यह मुश्किल नजर आता है।
क्या यह NATO के अंत की शुरुआत है?
अगर अमेरिका जैसे शक्तिशाली सदस्य ने ही ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश की—
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NATO उसे रोकने में असहाय नजर आएगा
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संगठन तुरंत खत्म नहीं होगा
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लेकिन उसकी विश्वसनीयता को गहरा झटका जरूर लगेगा
ग्रीनलैंड विवाद अब सिर्फ डेनमार्क-अमेरिका का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे NATO के अस्तित्व और उसकी उपयोगिता पर सवाल बन चुका है।
निष्कर्ष
ग्रीनलैंड संकट ने यह साफ कर दिया है कि NATO बाहरी दुश्मनों से तो निपट सकता है, लेकिन अंदरूनी टकराव के सामने वह कमजोर पड़ जाता है। 50 साल पुरानी दलील आज डेनमार्क के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी है।

