Currency Depriciation : रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के करीब, FPI बिकवाली और वैश्विक तनाव से कमजोर मुद्रा
Currency Depriciation : भारतीय रुपया 92 प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक तनाव से INR दबाव में। इससे महंगे इम्पोर्ट, उच्च विदेशी खर्च और निवेशकों की चिंताएं बढ़ीं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति सुधर सकती है अगर ग्लोबल मार्केट स्थिरता लौटे।
Currency Depriciation : रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के करीब
भारतीय रुपया (INR) 1 डॉलर के मुकाबले 91.99 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे यह लगभग 92 के पास आ गया है। PTI के अनुसार, दिन के कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता रहा।
विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली और वैश्विक व्यापारिक तनाव इसकी प्रमुख वजह माने जा रहे हैं।
साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। दिसंबर 2025 में पहली बार INR 90 के स्तर को पार किया था। अब महज 20 दिनों में यह 91 के स्तर को पार कर चुका है। मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, ग्लोबल टेंशन और शेयर बाजारों में अस्थिरता के कारण निवेशक गोल्ड और डॉलर में निवेश बढ़ा रहे हैं।
Currency Depriciation : रुपया कमजोर होने के प्रमुख कारण

1. विदेशी निवेशकों की निकासी
विदेशी निवेशक (FPI) लगातार भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। जनवरी 2026 के पहले 22 दिनों में FPIs ने ₹36,500 करोड़ की बिकवाली की।
जब निवेशक पैसा वापस लेते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है।
2. ट्रम्प की टैरिफ नीतियां और वैश्विक तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के यूरोपीय देशों के साथ बढ़ते तनाव और ‘ग्रीनलैंड विवाद’ ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी।
इस स्थिति में निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर और सोने में पैसा लगाते हैं, जिससे INR दबाव में आ रहा है।
3. मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उच्च ब्याज दरें
अमेरिका में बेरोजगारी कम है और अर्थव्यवस्था मजबूत है।
उच्च ब्याज दरों के कारण निवेशक अमेरिकी बैंक और बॉन्ड्स में निवेश बढ़ा रहे हैं, जिससे डॉलर की मजबूती बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
रुपये में रिकवरी की संभावना
CR Forex Advisors के MD अमित पाबारी के अनुसार, 92.00 पर रुपया मजबूत रेजिस्टेंस का सामना करेगा।
अगर वैश्विक तनाव कम होता है, तो INR 90.50–90.70 के स्तर तक सुधार सकता है।
रुपये में गिरावट का असर
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महंगे इम्पोर्ट
रुपए की कमजोरी से भारत के लिए इम्पोर्ट महंगा हो गया है। पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य कच्चा माल की कीमतों में इजाफा होगा।
विदेश में खर्च बढ़ा
विदेश में पढ़ाई और यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए खर्च बढ़ गया है। पहले 50 रुपए में 1 डॉलर मिलता था, अब 1 डॉलर के लिए 91 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
इससे छात्रों और ट्रैवलर्स की फीस, रहने-खाने और अन्य खर्च महंगे हो गए हैं।
करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
किसी भी मुद्रा की कीमत घटने को करेंसी डेप्रिसिएशन कहते हैं।
हर देश के पास फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व होता है, जिससे इंटरनेशनल लेनदेन किया जाता है।
यदि रिजर्व पर्याप्त हैं तो मुद्रा स्थिर रहती है, कम होने पर मुद्रा कमजोर होती है।
रुपये की कमजोरी के दीर्घकालिक प्रभाव
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इम्पोर्ट महंगा: कच्चे माल, पेट्रोलियम और इलेक्ट्रॉनिक्स के दाम बढ़ेंगे।
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विदेशी शिक्षा महंगी: छात्रों के लिए फीस, रहना और खाना महंगा।
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व्यापारिक निवेश प्रभावित: निवेशक विदेशी बाजारों में सुरक्षित निवेश ढूंढेंगे।
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महंगाई पर असर: डॉलर की मजबूती से महंगी वस्तुएं और सेवाएं बढ़ेंगी।
विदेशी निवेशक और वैश्विक संकेतक

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जनवरी 2026 के पहले 22 दिनों में FPIs ने ₹36,500 करोड़ की बिकवाली की।
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ग्लोबल व्यापार तनाव, अमेरिकी टैरिफ और यूरोपीय विवाद निवेशकों को सुरक्षित डॉलर और सोने में धकेल रहे हैं।
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अमेरिका में उच्च ब्याज दरें और मजबूत इकोनॉमी डॉलर की मांग को और बढ़ा रही हैं।
विशेषज्ञों की राय
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Amit Pabari (CR Forex Advisors): 92 पर मजबूत रेजिस्टेंस, ग्लोबल तनाव कम होने पर INR सुधर सकता है।
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Market Analyst: निवेशक गोल्ड और डॉलर में सुरक्षित निवेश करेंगे।
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Forex Expert: विदेशी निवेश की बिकवाली लगातार जारी रहेगी तो रुपये पर दबाव बना रहेगा।
निष्कर्ष
भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के करीब पहुंच गया है। FPI की बिकवाली, वैश्विक व्यापार तनाव और मजबूत अमेरिकी इकोनॉमी INR दबाव में हैं।
इसकी वजह से इम्पोर्ट महंगा हुआ, विदेश में खर्च बढ़ा और निवेशकों में चिंताएं बढ़ीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल स्थिरता लौटने पर रुपया सुधार सकता है, लेकिन फिलहाल सावधानी आवश्यक है।

