शर्मिला धनखड़ की कहानी संघर्ष से सफलता तक
शर्मिला धनखड़ की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि मुश्किल हालात से निकलकर अपनी पहचान बनाने की प्रेरक दास्तान है। बचपन में पोलियो के कारण एक पैर प्रभावित हुआ, परिवार आर्थिक तंगी से जूझता रहा और शादी के बाद उन्हें घरेलू हिंसा तथा अपमान का सामना करना पड़ा।
कई साल तक शर्मिला ने ऐसी जिंदगी देखी, जिसमें दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल था। इसके बावजूद उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। जिंदगी में बदलाव तब आया जब दूसरे पति अजीत सैनी ने उनकी शारीरिक क्षमता को पहचाना और उन्हें खेल की दुनिया में जाने के लिए प्रेरित किया।
शुरुआत में शर्मिला को खुद भी विश्वास नहीं था कि वह खिलाड़ी बन सकती हैं। लेकिन लगातार अभ्यास, अनुशासन और परिवार के सहयोग ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
आज वह पैरा एथलेटिक्स में अपनी पहचान बना चुकी हैं और शॉट-पुट में देश के लिए पदक जीत चुकी हैं।
बचपन में पोलियो, परिवार में गरीबी
शर्मिला का बचपन हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के छितरौली गांव में बीता। जब वह करीब दो साल की थीं, तब उनके पैर में पोलियो हो गया था।
परिवार में चार भाई-बहन थे। उनके पिता किसान थे और आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। परिवार पर कर्ज भी था। उनकी मां की आंखों की रोशनी बचपन में ही चली गई थी। घर का खर्च चलाने के लिए मां को विकलांगता पेंशन मिलती थी।
ऐसे माहौल में शर्मिला ने बचपन बिताया। परिवार में कई बार खाने तक की परेशानी रहती थी। उन्होंने बताया कि बचपन में दाल-रोटी और गुड़ के अलावा ज्यादा चीजों के बारे में उन्हें पता तक नहीं था।
19 साल की उम्र में परिवार ने उनकी शादी कर दी। शादी से पहले पति के बारे में पूरी जानकारी परिवार को नहीं थी।

शादी के बाद शुरू हुआ मुश्किल दौर
शर्मिला के मुताबिक, उनका पहला पति शराब का आदी था। शादी के समय भी वह नशे की हालत में पहुंचा था। शादी के बाद शर्मिला को लगातार अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ा।
दहेज को लेकर भी उन्हें ताने दिए जाते थे। पति कथित तौर पर उनकी शारीरिक अक्षमता को लेकर भी अपमानजनक बातें करता था।
घर की आर्थिक स्थिति खराब थी और पति के पास नियमित नौकरी भी नहीं थी। वह अक्सर शराब पीता और झगड़ा करता था।
शर्मिला के लिए सबसे कठिन दौर तब आया, जब उनकी छोटी बेटी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। इलाज के दौरान बच्ची की हालत बिगड़ती गई और आखिरकार उसकी मौत हो गई। इस घटना का दर्द शर्मिला आज भी याद करती हैं।
बेटियों के लिए भी लड़ीं शर्मिला धनखड़
दूसरी बेटी के जन्म के बाद भी घरेलू परिस्थितियां नहीं बदलीं। शर्मिला के अनुसार, पति मारपीट करता था और बच्चों की बीमारी के समय भी इलाज को लेकर गंभीरता नहीं दिखाता था।
तीसरी बार गर्भवती होने पर भी उन्हें मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। शर्मिला के अनुसार, पति गर्भ में बेटी होने की जानकारी मिलने के बाद गर्भपात कराने का दबाव डालता था।
ऐसे हालात में शर्मिला कुछ समय के लिए अपने मायके चली गईं। उन्होंने तय किया कि अपनी बेटियों को ऐसे वातावरण में बड़ा नहीं होने देंगी।
आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने आसपास के लोगों के कपड़े सिलने शुरू किए। बाद में डॉक्टर के यहां सफाई का काम किया और धीरे-धीरे नर्सिंग का काम भी सीखा।
लेकिन पति वहां भी पहुंच जाता और उनके काम में परेशानी पैदा करता। कई नौकरियां भी उन्हें इसी वजह से छोड़नी पड़ीं।
दूसरी शादी ने बदली जिंदगी की दिशा
लगातार संघर्ष के बीच शर्मिला की मुलाकात अजीत सैनी से हुई। अजीत ने उनकी परिस्थितियों को समझा और उन्हें इस रिश्ते से बाहर निकलने की सलाह दी।
बाद में अजीत ने शर्मिला से शादी करने और उनकी बेटियों को भी अपनाने की बात कही। शर्मिला ने पहले पति से तलाक लिया और 28 साल की उम्र में अजीत सैनी से दूसरी शादी कर ली।
इसके बाद उनकी जिंदगी में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।
अजीत ने शर्मिला के भीतर छिपी क्षमता को पहचाना। एक दिन घर में भारी बॉक्स बेड को शर्मिला ने अकेले खिसका दिया। यह देखकर अजीत को लगा कि उनमें अच्छी शारीरिक ताकत है और वह खेलों में आगे बढ़ सकती हैं।
शर्मिला को शुरुआत में यह विचार अजीब लगा। उन्हें लगता था कि वह सिर्फ घर का काम करने वाली महिला हैं और खेलों के बारे में उन्हें कुछ जानकारी नहीं है।
लेकिन अजीत ने हार नहीं मानी।
शर्मिला धनखड़ ने पैरा एथलेटिक्स में रखा कदम
अजीत ने दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध खेलों के बारे में जानकारी जुटाई और शर्मिला को रेवाड़ी के राव तुलाराम स्टेडियम ले गए।
वहां उनकी मुलाकात पैरा एथलीट कोच टेकचंद से हुई। कोच ने उन्हें शॉट-पुट की ट्रेनिंग शुरू करने की सलाह दी।
यहीं से शर्मिला की जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ।
शुरुआत में उन्हें स्टेडियम जाने और खेलों के कपड़े पहनने में झिझक होती थी। लेकिन अजीत लगातार उनका हौसला बढ़ाते रहे। उन्होंने शर्मिला से कहा कि अगर वह खेल में आगे बढ़ना चाहती हैं तो अभ्यास को प्राथमिकता देनी होगी।
शर्मिला ने धीरे-धीरे अपनी झिझक दूर की और नियमित प्रशिक्षण शुरू कर दिया।
लोगों के तानों को बनाया अपनी ताकत
स्टेडियम में शुरुआती दिनों में शर्मिला को उम्र और शारीरिक स्थिति को लेकर ताने भी सुनने पड़े।
एक व्यक्ति ने उनकी उम्र पूछने के बाद उन्हें खेल से दूर रहने की सलाह दी। एक अन्य खिलाड़ी ने कथित तौर पर उन्हें उम्रदराज बताते हुए घर बैठने की बात कही।
इन टिप्पणियों ने शर्मिला को दुखी जरूर किया, लेकिन उन्होंने अभ्यास छोड़ने के बजाय इसे चुनौती के रूप में लिया।
उन्होंने तय किया कि अब खेल ही उनकी नई पहचान बनेगा।
इसके बाद उन्होंने ट्रेनिंग में अपना पूरा ध्यान लगा दिया। नियमित अभ्यास के साथ उन्होंने अपनी डाइट पर भी ध्यान देना शुरू किया।
परिवार ने बेच दिया घर, लिया कर्ज
खेल में आगे बढ़ने के लिए अच्छी डाइट और प्रशिक्षण की जरूरत थी। शर्मिला की डाइट पर हर महीने बड़ी रकम खर्च होने लगी।
अजीत ने शर्मिला की प्रैक्टिस जारी रखने के लिए गैराज में ज्यादा मेहनत की। बाद में उन्होंने अपना घर बेच दिया। परिवार छोटे से बीपीएल क्वार्टर में रहने लगा।
शर्मिला की मां ने भी अपनी जमीन बेचकर उनकी ट्रेनिंग में सहयोग किया।
जब आर्थिक स्थिति और खराब हुई तो परिवार ने कर्ज तक लिया। अजीत ने नौकरी छोड़कर शर्मिला की ट्रेनिंग और जरूरतों पर ध्यान देना शुरू कर दिया।
यह सिर्फ शर्मिला की मेहनत नहीं थी। उनके परिवार ने भी उनके सपने को अपना सपना बना लिया था।
राष्ट्रीय स्तर पर सफलता ने बढ़ाया आत्मविश्वास
लगातार मेहनत का परिणाम जल्द सामने आया। करीब एक साल की कड़ी तैयारी के बाद शर्मिला ने राष्ट्रीय चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता।
इस उपलब्धि ने उनके परिवार का विश्वास और मजबूत कर दिया।
इसके बाद शर्मिला ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयारी जारी रखी।
उनकी बेटियों को भी खेलों से जोड़ा गया। परिवार ने खेल को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया।
कॉमनवेल्थ में शर्मिला धनखड़ ने जीता गोल्ड
शर्मिला की मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम कॉमनवेल्थ गेम्स में देखने को मिला। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने महिला शॉट-पुट में गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
प्रतियोगिता के दौरान उनका मुकाबला मजबूत खिलाड़ियों से था। शर्मिला ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 9.81 मीटर का थ्रो किया और स्वर्ण पदक हासिल किया।
गोल्ड मेडल जीतने के बाद उनकी आंखों में आंसू आ गए। उनके सामने संघर्ष के वे सभी साल घूम गए, जब उनके पास खाने तक के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे और उन्हें घरेलू हिंसा तथा सामाजिक तानों का सामना करना पड़ा था।
उनके लिए यह पदक सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं था। यह वर्षों की मेहनत, परिवार के त्याग और खुद पर विश्वास की जीत थी।
2022 से अंतरराष्ट्रीय सफर
शर्मिला ने 2022 में बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया था। इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी मौजूदगी मजबूत की।
2026 में दुबई में आयोजित फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया।
इसके बाद ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी उपलब्धियों में एक और बड़ी कामयाबी जोड़ दी।

गोल्ड के बाद बदली जिंदगी
शर्मिला का कहना है कि पदक जीतने के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है। उन्हें अलग-अलग जगह सम्मानित किया जा रहा है।
उन्हें सरकारी स्तर पर भी पुरस्कार और सहयोग मिला। इसके अलावा वह लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में भी हिस्सा लेकर 12 लाख रुपये जीत चुकी हैं।
एक ज्वेलर ने उन्हें सोने के सिक्के और हीरे का सेट भी भेंट किया।
लेकिन शर्मिला के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाना है।
अजीत सैनी को देती हैं सफलता का श्रेय
शर्मिला अपनी सफलता में अपने दूसरे पति अजीत सैनी की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं।
अजीत ने उस समय उनका साथ दिया जब उनके पास आगे बढ़ने के लिए संसाधन नहीं थे। उन्होंने घर बेचा, नौकरी छोड़ी, कर्ज लिया और शर्मिला की ट्रेनिंग तथा डाइट के लिए लगातार मेहनत की।
शर्मिला के मुताबिक, अजीत ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि उनकी जिंदगी सिर्फ घरेलू परेशानियों तक सीमित नहीं है।
आज जब शर्मिला देश और दुनिया में अपने प्रदर्शन के लिए पहचानी जाती हैं, तो वह अपने परिवार के त्याग को याद करती हैं।
निष्कर्ष
शर्मिला धनखड़ की कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियां किसी इंसान की अंतिम पहचान नहीं होतीं। पोलियो, गरीबी, घरेलू हिंसा, बेटियों की चिंता और सामाजिक तानों के बीच उन्होंने अपने जीवन को नई दिशा दी।
उनकी कहानी में सबसे बड़ा संदेश यही है कि सही सहयोग, निरंतर मेहनत और आत्मविश्वास के साथ मुश्किल परिस्थितियों को बदला जा सकता है।
जिस महिला को कभी स्टेडियम में उम्र को लेकर ताने सुनने पड़े थे, उसी शर्मिला धनखड़ ने बाद में अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगे के साथ गोल्ड मेडल हासिल किया। उनका सफर संघर्ष से सम्मान और बेबसी से आत्मनिर्भरता तक की प्रेरक मिसाल बन गया है।
नोट: यह खबर उपलब्ध विवरण और शर्मिला धनखड़ के बताए अनुभवों के आधार पर पुनर्लिखी गई है। व्यक्तिगत आरोपों और घटनाओं से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
Watch More:- https://youtu.be/liYN_ifx-So

