Indore Updates : उड़ान से पहले गिने गए गिद्ध, ठंड की सुबह 3 दिन चला काउंट, डिजिटल तकनीक से बढ़ी सटीकता
Indore Updates : मध्य प्रदेश में तीन दिन चली गिद्ध गणना में पिछली बार से अधिक संख्या दर्ज हुई। इंदौर वन मंडल में 86 से बढ़कर 156 गिद्ध मिले। ठंड की सुबह 6:30 से 8:30 बजे तक गिनती की गई। डिजिटल एप “EP Collect Five” से डेटा अपलोड कर सटीक मॉनिटरिंग की गई।
Indore Updates : तीन दिन में पूरी हुई गिद्धों की गणना

Indore Forest Division में पिछली गणना में 86 गिद्ध दर्ज हुए थे, जबकि इस बार यह संख्या बढ़कर 156 तक पहुंच गई है। यह संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत माना जा रहा है।
ठंड की सुबह क्यों चुना गया समय?
आम लोगों में जिज्ञासा रहती है कि आसमान में ऊंची उड़ान भरने वाले गिद्धों की गिनती कैसे संभव होती है। इसका उत्तर उनकी जैविक विशेषता में छिपा है।
गिद्धों को उड़ान भरने के लिए थर्मल यानी गर्म हवा की जरूरत होती है। जब तक उन्हें पर्याप्त तापमान नहीं मिलता, वे अपने बड़े पंख फैलाकर उड़ान नहीं भर पाते।
इसी कारण फरवरी की ठंड के दौरान 20 से 22 फरवरी के तीन दिन तय किए गए। सुबह 6:30 से 8:30 बजे तक का समय चुना गया, जब गिद्ध अपने बसेरों—ऊंची पहाड़ियों, चट्टानों और किलों—पर बैठे रहते हैं।
मास्टर ट्रेनर ने सिखाई तकनीक
इस बार इंदौर वन मंडल में वन विभाग की टीम को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ Ajay Gadikar ने दिया, जो मास्टर ट्रेनर के रूप में शामिल रहे।
वन विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में एक दिवसीय प्रशिक्षण में टीम को बताया गया कि:
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गिद्धों की पहचान कैसे करें
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प्रजाति के आधार पर अलग-अलग काउंटिंग
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छोटे और व्यस्क गिद्धों में अंतर
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मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार दिन तय करना
मौसम विभाग के पूर्वानुमान के आधार पर तेज ठंड वाले दिन चुने गए ताकि गिद्ध अपने ठिकानों पर ही मिल सकें।
कैसे की गई गिनती?
टीमें सुबह निर्धारित स्थलों पर पहुंचीं, जिनमें शामिल थे:
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ट्रेंचिंग ग्राउंड
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मोहाड़ी फॉल
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चोरल क्षेत्र
इन स्थानों पर दो घंटे के भीतर गिनती पूरी करने का लक्ष्य रखा गया। हालांकि 20 फरवरी को कुछ जगह बारिश के कारण देरी हुई, लेकिन बाकी दिनों में टीमें समय पर पहुंचीं।
गिद्धों की प्रकृति के अनुसार जैसे ही धूप निकलती है और तापमान बढ़ता है, उनमें ऊर्जा आती है और वे उड़ान भर लेते हैं। इसलिए सुबह का समय सबसे सटीक माना जाता है।
डिजिटल तरीका बना सहायक


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लोकेशन स्वतः कैप्चर हो जाती है
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समय ऑटोमैटिक दर्ज होता है
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गिद्धों के फोटो सीधे अपलोड किए जाते हैं
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प्रजाति और संख्या तुरंत फीड होती है
हालांकि मैनुअल (कागज-पेन) पद्धति भी बैकअप के रूप में रखी गई थी, लेकिन डिजिटल डेटा संग्रह इतना प्रभावी रहा कि उसकी आवश्यकता नहीं पड़ी।
धीरे बढ़ती है गिद्धों की आबादी
विशेषज्ञों के अनुसार एक व्यस्क गिद्ध की जोड़ी साल में केवल एक अंडा देती है। इसलिए इनकी वृद्धि दर बेहद धीमी होती है।
हालांकि Egyptian Vulture कभी-कभी दो अंडे भी देती है, जिससे थोड़ी वृद्धि संभव होती है।
1990 के दशक में देशभर में गिद्धों की संख्या लाखों में थी, लेकिन बाद में यह तेजी से घटकर हजारों में रह गई।
डाइक्लोफिनाक प्रतिबंध से मिला सहारा

गिद्धों की संख्या घटने का बड़ा कारण पशुओं में इस्तेमाल होने वाली दवा डाइक्लोफिनाक थी। जब इस दवा से उपचारित पशु की मृत्यु होती थी और गिद्ध उसे खाते थे, तो उनकी भी मौत हो जाती थी।
इस जानलेवा पेस्टीसाइड पर प्रतिबंध लगने के बाद स्थिति में सुधार हुआ है। अब वन विभाग ने:
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नेस्ट की नियमित मॉनिटरिंग
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बसेरों की सुरक्षा
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संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी
जैसे कदम उठाए हैं।
बदल रही है गिद्धों की जीवनशैली

रोचक तथ्य यह भी सामने आया कि जहां पहले गिद्ध केवल ऊंची पहाड़ियों और चट्टानों पर बसेरा करते थे, वहीं अब सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़े मोबाइल टावरों पर भी उन्हें देखा जा रहा है।
प्रदेश के कई स्थानों पर वन विभाग की टीम ने टावरों पर बैठे गिद्धों के विजुअल्स भी कैप्चर किए हैं। यह दर्शाता है कि बदलते पर्यावरण में गिद्ध अपनी जीवनशैली में भी बदलाव ला रहे हैं।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश में हुई ताजा गणना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संरक्षण प्रयास रंग ला रहे हैं। ठंड की सुबह, वैज्ञानिक तकनीक और डिजिटल एप के उपयोग से गिद्धों की सटीक गिनती संभव हो पाई।
प्रकृति के इन सफाईकर्मियों की बढ़ती संख्या पर्यावरण संतुलन के लिए सकारात्मक संकेत है। यदि इसी तरह संरक्षण जारी रहा तो आने वाले वर्षों में गिद्धों की आबादी और मजबूत हो सकती है।

