UK Refuses Giving Airbase To US : ब्रिटेन ने US को एयरबेस देने से किया इनकार, चागोस विवाद पर ट्रम्प नाराज
UK Refuses Giving Airbase To US : ब्रिटेन ने अमेरिका को ईरान पर संभावित हमले के लिए RAF फेयरफोर्ड और डिएगो गार्सिया जैसे ठिकाने देने से इनकार किया। रिपोर्ट के अनुसार डोनाल्ड ट्रम्प इस फैसले से नाराज हैं। चागोस द्वीप समूह समझौते और अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर दोनों देशों में मतभेद बढ़े हैं।
UK Refuses Giving Airbase To US : ब्रिटेन ने US को एयरबेस देने से किया इनकार, ईरान हमले की अटकलें तेज
इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नाराज होने की खबरें हैं।
डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड क्यों अहम?
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है। 1970 के दशक से यह ब्रिटेन और अमेरिका का साझा सैन्य अड्डा रहा है।
वहीं RAF Fairford ब्रिटेन का प्रमुख एयरबेस है, जहां से लंबी दूरी के बमवर्षक विमान उड़ान भर सकते हैं।
डिएगो गार्सिया ईरान की राजधानी तेहरान से करीब 3,800 किलोमीटर दूर है। इसकी रणनीतिक स्थिति के कारण यहां से B-2, B-52 जैसे भारी बमवर्षक और KC-135 जैसे टैंकर विमान ऑपरेट किए जा सकते हैं। गहरे पानी का बंदरगाह भी यहां मौजूद है।
चागोस द्वीप समूह पर विवाद
चागोस द्वीप समूह 1814 से ब्रिटेन के नियंत्रण में रहा है। 1965 में इसे मॉरीशस से अलग कर ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ घोषित किया गया।
1968 में मॉरीशस को आजादी देते समय यह आश्वासन दिया गया था कि रक्षा जरूरत खत्म होने पर द्वीप लौटाए जाएंगे।
मॉरीशस 1980 के दशक से इन द्वीपों पर संप्रभुता का दावा करता रहा है। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा था कि डिकॉलोनाइजेशन की प्रक्रिया अधूरी रही और ब्रिटेन को प्रशासन समाप्त करना चाहिए।
ट्रम्प की नाराजगी
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चागोस द्वीप समूह छोड़ने के फैसले की आलोचना की। उनका कहना है कि डिएगो गार्सिया जैसा रणनीतिक ठिकाना छोड़ना बड़ी गलती होगी।
बताया जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया, जिसमें चागोस को मॉरीशस को सौंपने की बात थी।
ब्रिटेन का रुख: कानूनी और कूटनीतिक संतुलन

ब्रिटेन का कहना है कि मॉरीशस के साथ समझौता लंबे और महंगे कानूनी विवाद से बचने के लिए जरूरी है। सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यदि कोई देश जानता है कि सैन्य कार्रवाई गलत है और फिर भी मदद करता है, तो उसे भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन खुद को अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने वाले राष्ट्र के रूप में पेश करना चाहता है।
UK–US रिश्तों में खटास?
ब्रिटेन और अमेरिका की साझेदारी दूसरे विश्व युद्ध, NATO और खुफिया गठबंधन ‘फाइव आइज’ तक फैली रही है। लेकिन हाल के वर्षों में कई मुद्दों पर मतभेद उभरे हैं—
-
सैन्य कार्रवाई पर अलग सोच: इराक युद्ध के बाद ब्रिटेन सतर्क रुख अपनाता दिख रहा है, जबकि अमेरिका त्वरित कार्रवाई के पक्ष में रहता है।
-
चागोस संप्रभुता विवाद: अमेरिका हिंद महासागर में रणनीतिक पकड़ कमजोर होने की आशंका जता रहा है।
-
विदेश नीति का दृष्टिकोण: अमेरिका की सख्त और सौदेबाजी आधारित नीति बनाम ब्रिटेन का नियम-आधारित दृष्टिकोण।
-
ग्रीनलैंड विवाद: ट्रम्प के ग्रीनलैंड खरीदने के बयान पर यूरोपीय देशों के साथ ब्रिटेन ने भी संप्रभुता के सम्मान की बात की थी।
ईरान पर संभावित हमले की अटकलें
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता नहीं होता, तो अमेरिका हिंद महासागर और यूरोप स्थित एयरफील्ड का उपयोग कर सकता है। हालांकि इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
डिएगो गार्सिया पहले भी मध्य-पूर्व और अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों के दौरान इस्तेमाल किया जा चुका है।
निष्कर्ष
ब्रिटेन द्वारा एयरबेस उपलब्ध न कराने का फैसला केवल सैन्य रणनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और भू-राजनीतिक संतुलन से जुड़ा है। चागोस द्वीप समूह विवाद और ईरान को लेकर बढ़ती तनातनी ने UK–US संबंधों में नई जटिलताएं पैदा कर दी हैं। आने वाले समय में यह देखना होगा कि दोनों देश कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ते हैं या मतभेद और गहराते हैं।


