Maa Ashapura Asalpur Dham : नवरात्रि अष्टमी पर आसलपुर धाम में उमड़ा विशाल श्रद्धा सैलाब
Maa Ashapura Asalpur Dham : चैत्र नवरात्रि अष्टमी पर जयपुर के आसलपुर धाम स्थित मां आशापुरा मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर भक्तों ने दर्शन किए। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां मां आशापुरा पर्वत चीरकर प्रकट हुई थीं। मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं सुनिश्चित की हैं।
Maa Ashapura Asalpur Dham : पर्वत चीरकर प्रकट हुईं मां आशापुरा, जयकारों और भक्ति में डूबा आसलपुर धाम
नवरात्रि अष्टमी पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर भक्तों ने किए दर्शन
चैत्र नवरात्रि की अष्टमी के पावन अवसर पर मां आशापुरा मंदिर आसलपुर में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। जयपुर जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित आसलपुर गांव में विराजमान मां आशापुरा के दरबार में हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं, जो दिनभर लगातार बढ़ती रहीं।
“जय माता दी” के जयकारों से पूरा धाम गूंज उठा और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बन गया। दूर-दराज के गांवों और शहरों से श्रद्धालु परिवार सहित यहां पहुंचे और माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना की। नवरात्रि के इस विशेष अवसर पर आसलपुर धाम आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया।
पहाड़ी की गुफा में विराजमान माता, सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु
आसलपुर धाम का यह प्राचीन मंदिर अपने अनोखे स्वरूप और धार्मिक महत्व के कारण पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। यहां पहाड़ी की गुफा में विराजमान मां आशापुरा के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह चढ़ाई आसान नहीं होती, लेकिन भक्तों के उत्साह और श्रद्धा के आगे कठिनाई भी छोटी नजर आती है।
श्रद्धालु सुबह से ही कतारों में लगकर धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं। रास्ते में भजन-कीर्तन और जयकारों की गूंज वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना देती है। कई श्रद्धालु नंगे पैर ही माता के दर्शन करने पहुंचते हैं, जो उनकी गहरी आस्था और विश्वास को दर्शाता है।
नवरात्रि के दिनों में मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया जाता है और सुरक्षा तथा व्यवस्था के लिए स्वयंसेवकों की तैनाती की जाती है, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
धार्मिक मान्यता: विक्रम संवत 699 में पर्वत चीरकर प्रकट हुई थीं मां आशापुरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विक्रम संवत 699 में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन मां आशापुरा इसी पवित्र स्थल पर पर्वत को चीरकर प्रकट हुई थीं। यह घटना स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसी कारण इस स्थान को मां आशापुरा का प्रथम प्रकट्य स्थल माना जाता है।
मंदिर के पुजारी मोहित शर्मा के अनुसार, देवी ने सबसे पहले सांभर के तत्कालीन नरेश माणकराव को दर्शन दिए थे। देवी ने उन्हें इसी स्थान पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया, जिसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। तभी से हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन यहां भव्य प्रागट्योत्सव मनाया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं और माता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
कई समाजों की कुलदेवी हैं मां आशापुरा, विशेष श्रद्धा से होती है पूजा
समिति संरक्षक महावीर सिंह राव ने बताया कि आसलपुर धाम को राजस्थान में मां आशापुरा का प्रमुख और ऐतिहासिक स्थल माना जाता है। यही कारण है कि चौहान वंश सहित कई समाज—मैढ़ क्षत्रिय, स्वर्णकार, सोनी, मौसूण, राव, जाट, गुर्जर और माली समाज—मां आशापुरा को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
यहां माता के सात्विक स्वरूप की आराधना की जाती है। पूजा के दौरान भक्त माता को मिष्ठान, चावल, लापसी और नारियल का भोग अर्पित करते हैं। नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।
मंदिर परिसर में भक्तों द्वारा भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं, जो पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं, भोजन और पेयजल की सुविधा उपलब्ध

नवरात्रि के अवसर पर मंदिर सेवा समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए व्यापक और सुव्यवस्थित व्यवस्थाएं की गई हैं। समिति अध्यक्ष शिवरतन सोनी ने बताया कि भक्तों के ठहरने, पेयजल और भोजन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।
इसके साथ ही व्रतधारियों के लिए फलाहार की विशेष सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है। मंदिर परिसर में साफ-सफाई, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सहायता प्रदान की जा सके।
स्वयंसेवकों की टीम लगातार श्रद्धालुओं की सहायता कर रही है और व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।
आसलपुर नाम की कहानी भी जुड़ी है मां आशापुरा की आस्था से

स्थानीय मान्यता के अनुसार, आसलपुर गांव का नाम भी मां आशापुरा की आस्था और इतिहास से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब देवी इस पवित्र स्थल पर प्रकट हुईं, तब यहां धीरे-धीरे लोगों की बसावट शुरू हुई।
मां आशापुरा के नाम से प्रेरित होकर इस गांव का नाम “आसलपुर” रखा गया। समय के साथ यह स्थान एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो गया और आज भी हजारों श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।
हर नवरात्रि, अष्टमी और अन्य विशेष पर्वों पर यहां भव्य आयोजन किए जाते हैं, जो इस धाम की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और अधिक मजबूत बनाते हैं।
आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना आसलपुर धाम
आज के समय में आसलपुर धाम न केवल जयपुर जिले बल्कि पूरे राजस्थान के लिए आस्था और विश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दरबार में अपनी समस्याएं और मनोकामनाएं लेकर आते हैं और आशीर्वाद प्राप्त कर संतोष और शांति का अनुभव करते हैं।
नवरात्रि के इस पावन अवसर पर एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि मां आशापुरा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था अटूट है और भविष्य में भी यह धाम धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।
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