Jodhpur Updates : 333 वर्षों से जीवित है रावजी की गैर परंपरा
हर वर्ष की तरह इस बार भी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है और समाज में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है।
मंडावता बेरा से शुरू होती है गैर यात्रा
जानकारी के अनुसार, गैर का शुभारंभ मंडावता बेरा मंदिर चौक से पूजा-अर्चना के साथ किया जाता है। इसके बाद गैर विभिन्न बेरों से होती हुई आगे बढ़ती है:
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खोखरिया बेरा
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मंडावता चौराहा
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भिंयाली बेरा
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गोपी का बेरा
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फतेहबाग
अंततः गैर मंडोर उद्यान पहुंचकर राव कुंड में समापन करती है। यहां से गैर को साथ लेकर मंडावता चौराहा होते हुए भिंयाली बेरा, गोपी का बेरा होते हुए फतेहबाग आएगी। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया गैर में चंग की थाप पर गैर की टोलियां नृत्य और गीत गाते हुए शामिल होगी। गेर का समापन मंडोर उद्यान पहुंचने पर होगा।
पूरे मार्ग में चंग की थाप पर गैर की टोलियां नृत्य और पारंपरिक गीत प्रस्तुत करती हैं, जिससे माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है।
इस तरह होता है राव का चयन

इस परंपरा की सबसे खास बात है “राव” का चयन।
बहादुर सिंह गहलोत के अनुसार:
खास बात यह है कि राव का चयन खोखरिया बेरा से किया जाता है। आमली बेरा के दो परिवार बारी-बारी से चयन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
चयनित युवक की पीठ पर छापा लगाया जाता है और फिर उसका पारंपरिक शृंगार किया जाता है। इसके बाद वह पूरे जुलूस का केंद्र बन जाता है।
आठ बेरों की गैर होती है शामिल

गैर में कुल आठ बेरों की सहभागिता रहती है:
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खोखरिया बेरा
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बड़ा बेरा
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गोपी बेरा
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आमली बेरा
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फूलबाग बेरा
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नागौरी बेरा
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मंडोर बेरा
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पदाला बेरा
सभी बेरा मिलकर सामूहिक रूप से इस परंपरा को जीवित रखते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
सुरक्षा की विशेष व्यवस्था
राव के चयन के बाद उसे सुरक्षित रूप से मंडोर उद्यान स्थित राव कुंड तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मंडावता बेरा के लोगों की होती है।
सुरक्षा दल के सदस्य लाठियां और हॉकियां लेकर राव के चारों ओर घेरा बनाते हुए चलते हैं। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि राव सकुशल राव कुंड तक पहुंचे।
जैसे ही राव कुंड में डुबकी लगाता है, सुरक्षा की जिम्मेदारी पूर्ण मानी जाती है। इसके बाद अन्य युवक भी स्नान करते हैं और कार्यक्रम का समापन होता है।
मंडोर उद्यान में होता है समापन
राव के कुंड में स्नान करते ही 333 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा एक और वर्ष के लिए पूर्ण हो जाती है।
सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण
जोधपुर की यह परंपरा केवल एक धार्मिक या सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, अनुशासन और सामूहिक सहयोग का प्रतीक है।
333 वर्षों से शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित हो रही यह गैर आज भी समाज के युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है।
धूलंडी के दिन मंडोर क्षेत्र रंग, संगीत और परंपरा के अनूठे संगम का साक्षी बनता है, जो जोधपुर की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है।