Russian Crude Oil Trade : ईरान युद्ध के बीच भारत अप्रैल में रूस से 6 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदेगा
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Russian Crude Oil Trade : मिडिल ईस्ट में इजराइल-ईरान युद्ध के कारण तेल सप्लाई प्रभावित होने पर भारत ने अप्रैल के लिए रूस से 6 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदने का फैसला किया है। यह तेल अब डिस्काउंट के बजाय प्रीमियम पर मिल रहा है। सप्लाई सुधारने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति अपनाई गई है।
Russian Crude Oil Trade : ईरान युद्ध के बीच भारत अप्रैल में रूस से 6 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदेगा
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और सप्लाई चेन में आई बाधाओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। भारत ने अप्रैल महीने की डिलीवरी के लिए रूस से लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल की खरीद का सौदा किया है।
यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है और पारंपरिक सप्लाई मार्ग प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने और घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित होने से बढ़ी सप्लाई की चुनौती
मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग Strait of Hormuz प्रभावित हुआ है।
इस मार्ग के असुरक्षित होने से सऊदी अरब और इराक जैसे देशों से भारत को मिलने वाली तेल आपूर्ति में रुकावट आने लगी थी। इसी कमी को पूरा करने के लिए भारत ने फिर से रूसी तेल की ओर रुख किया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो दुनिया भर में तेल की कीमतों और आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
फरवरी के मुकाबले दोगुनी हुई रूसी तेल की खरीद
डेटा इंटेलिजेंस फर्म केपलर के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल के लिए रूस से की गई यह खरीद फरवरी की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है। हालांकि यह मात्रा मार्च के स्तर के लगभग बराबर ही बताई जा रही है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और सप्लाई रुकने की आशंका के कारण भारतीय कंपनियां अब ऐसे स्रोत तलाश रही हैं, जहां से तेल की आपूर्ति बिना बाधा के हो सके।
इसी कारण पिछले कुछ हफ्तों में रूसी तेल की मांग में अचानक तेजी देखी गई है।
डिस्काउंट की जगह अब प्रीमियम पर मिल रहा रूसी तेल
दिलचस्प बात यह है कि जो रूसी तेल पहले भारत को भारी छूट (डिस्काउंट) पर मिलता था, अब उसी के लिए अतिरिक्त कीमत यानी प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अप्रैल के लिए किए गए सौदे ब्रेंट क्रूड की कीमतों से 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा पर तय किए गए हैं।
इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण हैं:
- वैश्विक सप्लाई की कमी
- मांग में तेज बढ़ोतरी
- युद्ध के कारण जोखिम और परिवहन लागत में वृद्धि
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अस्थायी हो सकती है, लेकिन जब तक युद्ध जारी रहेगा, तब तक कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

अमेरिका की छूट से संभव हुई तेल खरीद
भारत की इस खरीदारी के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दी गई विशेष छूट का बड़ा योगदान है।
अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को लेने की अनुमति दी है, जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे। बाद में इस छूट की समय सीमा बढ़ाकर 12 मार्च तक कर दी गई।
यह छूट विशेष रूप से इसलिए दी गई ताकि होर्मुज स्ट्रेट में आई बाधा के कारण पैदा हुई तेल की कमी को दूर किया जा सके और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनी रहे।
सऊदी और इराक का तेल खाड़ी में फंसा
पिछले साल के अंत में अमेरिका के दबाव के कारण भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी थी और सऊदी अरब तथा इराक जैसे देशों की ओर रुख किया था।
लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद इन देशों का अधिकांश तेल पर्शियन गल्फ के अंदर ही फंस गया है, जिससे भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ी।
नई दिल्ली के अधिकारियों को उम्मीद है कि जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक अमेरिका अपनी छूट की अवधि को आगे बढ़ाता रहेगा।
MRPL और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी की रूसी बाजार में वापसी

रूसी तेल से दूरी बनाने वाली भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां अब फिर से सक्रिय हो गई हैं।
इनमें प्रमुख कंपनियां शामिल हैं:
- Mangalore Refinery and Petrochemicals Limited (MRPL)
- Hindustan Mittal Energy Limited
इन कंपनियों का मुख्य उद्देश्य घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त तेल भंडार तैयार करना है, ताकि किसी भी संभावित संकट के समय बाजार में ईंधन की कमी न हो।
वेनेजुएला से भी बढ़ा आयात, 4 साल का रिकॉर्ड टूटा
भारत अपनी तेल सप्लाई को विविध (डाइवर्सिफाई) करने के लिए अन्य देशों से भी संपर्क बढ़ा रहा है।
केपलर के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में वेनेजुएला से भारत का कच्चा तेल आयात लगभग 8 मिलियन बैरल तक पहुंच सकता है।
यह अक्टूबर 2020 के बाद का सबसे उच्च स्तर माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग देशों से तेल आयात करने की रणनीति से सप्लाई जोखिम कम होता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है।
बढ़ती मांग से रूस को मिल रहा बड़ा आर्थिक फायदा
भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देशों की बढ़ती मांग और ऊंची कीमतों के कारण रूस को अच्छा मुनाफा हो रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रूस का तेल निर्यात राजस्व लगातार बढ़ा है और मार्च 2022 के बाद यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत के पास रूस के अलावा बहुत कम विकल्प हैं, क्योंकि वेनेजुएला के तेल की गुणवत्ता रूसी तेल जैसी नहीं है और मिडिल ईस्ट का मार्ग अभी असुरक्षित बना हुआ है।
निष्कर्ष: ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारत की रणनीतिक तैयारी
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और वैश्विक सप्लाई संकट के बीच भारत ने समय रहते रणनीतिक कदम उठाते हुए वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीद बढ़ा दी है।
रूस से 6 करोड़ बैरल तेल खरीदने का फैसला यह दिखाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने और बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रहा है।
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