Bombay Highcoart : सिंगल मदर ही पूर्ण गार्जियन, बच्चे की पहचान गैर-मौजूद पिता से जोड़ना गलत
Bombay Highcoart : बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने कहा कि अकेले बच्चे का पालन-पोषण करने वाली मां पूर्ण अभिभावक है। रेप पीड़ित मां की याचिका पर कोर्ट ने स्कूल रिकॉर्ड से पिता का नाम हटाने की अनुमति दी। आर्टिकल 14 और 21 के तहत गरिमा और समानता के अधिकार पर जोर दिया।
Bombay Highcoart : रेप पीड़ित मां के पक्ष में सुनाया फैसला

यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक रेप पीड़ित मां ने अपनी बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड से पिता का नाम हटाने की मांग की थी।
क्या है मामला?
मामले में मां दुष्कर्म पीड़िता है। डीएनए परीक्षण में आरोपी को जैविक पिता सिद्ध किया गया था, लेकिन उसने बच्चे से अलग रहना चुना। इसके बावजूद जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम दर्ज था।
जब स्कूल प्रशासन ने रिकॉर्ड में संशोधन से इनकार कर दिया, तो मां और बेटी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
Bombay Highcoart : कोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर की डिवीजन बेंच ने 2 फरवरी को फैसला सुनाते हुए कहा:
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बच्चे की नागरिक पहचान के लिए सिंगल मदर को पूर्ण पेरेंट मानना कोई “दान” नहीं, बल्कि संवैधानिक वफादारी है।
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समाज खुद को विकसित कहता है, तो वह बच्चे की पहचान ऐसे पिता से नहीं जोड़ सकता, जिसका उसके जीवन में कोई संबंध ही नहीं है।
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जब मां ही अकेली गार्जियन हो, तो स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम हटाकर मां का नाम और सरनेम दर्ज करना सार्वजनिक हित के खिलाफ नहीं है।
Bombay Highcoart : आर्टिकल 21 और 14 का हवाला
बेंच ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता, बल्कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी सुनिश्चित करता है।
सम्मान का अर्थ यह भी है कि बच्चे की पहचान जबरन किसी गैर-मौजूद अभिभावक से न जोड़ी जाए।
साथ ही, अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पहचान को केवल पिता के माध्यम से तय करना एक न्यूट्रल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है।
स्कूल रिकॉर्ड सार्वजनिक दस्तावेज
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल रिकॉर्ड कोई निजी दस्तावेज नहीं है। यह सार्वजनिक दस्तावेज होता है, जो बच्चे के शैक्षणिक और पेशेवर जीवन में वर्षों तक उपयोग में आता है।
सिर्फ फॉर्मेट के कारण पिता का नाम बनाए रखना उचित नहीं है, खासकर जब पिता का जीवन में कोई योगदान या संबंध न हो।
जाति बदलने पर कोर्ट का रुख

बच्ची की जाति से संबंधित अर्जी पर कोर्ट ने कहा कि जाति को मनमाने तरीके से बदला नहीं जा सकता और स्कूल जाति प्रमाणन संस्था नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि यदि बच्चा अपनी मां के साथ रह रहा है और पिता से स्थायी अलगाव हो चुका है, तो रिकॉर्ड में वास्तविक सामाजिक स्थिति दर्शाना जरूरी है।
बेंच ने कहा कि यह राहत किसी मनमाने बदलाव के लिए नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि सुधारने के लिए दी जा रही है।
सिंगल मदर्स के अधिकारों को मान्यता
औरंगाबाद पीठ ने कहा कि जो महिलाएं अपने बच्चों की परवरिश अकेले करती हैं, उनके अधिकारों को प्रशासनिक स्तर पर भी मान्यता मिलनी चाहिए।
पिता का नाम अनिवार्य और मां का नाम वैकल्पिक रखना असमानता को संस्थागत रूप से दोहराना है। यह व्यवस्था संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि
कोर्ट ने यह भी कहा कि जाति प्रमाणपत्र के दुरुपयोग जैसी चिंताएं वाजिब हैं, इसलिए राहत इस तरह दी जानी चाहिए कि प्रक्रिया की पारदर्शिता बनी रहे और बच्चे का हित सुरक्षित रहे।
अंततः अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में “बच्चे की भलाई” सर्वोच्च मानक होना चाहिए।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला सिंगल मदर्स के अधिकारों और बच्चों की गरिमापूर्ण पहचान के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि संवैधानिक मूल्यों के तहत मां भी पूर्ण अभिभावक है और बच्चे की पहचान ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़ी जा सकती, जिसका उसके जीवन में कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है।

